१२०समाधितंत्र तमित्थंभूतं शमं स याति । नेतरः तद्विलक्षणो बहिरात्मा ।।६७।।
टीका — शरीरमेव कंचुकं तेन संवृतः सम्यक् प्रच्छादितो ज्ञानमेव विग्रहः स्वरूपं यस्य । तेनाथी विपरीत लक्षणवाळो बहिरात्मा (तेवी शान्ति पामी शकतो नथी.)
भावार्थ : — जेने शरीरादिरूप जगत् काष्ट – पाषाणादि तुल्य अचेतन – जड अने निश्चेष्ट भासे छे, अर्थात् परिणमनरूप क्रियाथी अने सुखादि अनुभवरूप भोगथी रहित प्रतिभासे छे, ते एवी परम वीतरागतारूप शान्तिने पामे छे, के जेमां मन – वचन – कायनी प्रवृत्तिनो तथा इन्द्रियोना विषयभोगनो अभाव होय छे. अज्ञानी बहिरात्मा आवी शान्ति पामतो नथी.
जे समये अन्तरात्मा आत्मस्वरूपनी भावना करतां करतां स्वरूपमां स्थिर थई जाय छे, ते समये तेने आ जडक्रियात्मक – प्रवृत्तिमय जगत् तरफनुं लक्ष छूटी जाय छे अने ते परम वीतरागताने प्राप्त थई निर्विकल्प निराकुल आनंद अनुभवे छे. ६७.
ते (बहिरात्मा) पण एवी रीते शरीरादिथी भिन्न आत्माने केम प्राप्त करतो (जाणतो) नथी? ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (शरीरकंचुकेन) शरीररूपी कांचळीथी (संवृतज्ञानविग्रहः आत्मा) जेनुं ज्ञानरूपी शरीर ढंकायेलुं छे ते बहिरात्मा (आत्मानं) आत्माना यथार्थ स्वरूपने (न बुध्यते) जाणतो नथी; (तस्मात्) तेथी (अतिचिरं) बहु लांबा काळ सुधी (भवे) संसारमां ते (भ्रमति) भमे छे.
टीका : — शरीर ते ज कंचुक (कांचळी) – तेनाथी ढंकायेलुं एटले सारी रीते आच्छादित थयेलुं ज्ञानरूपी शरीर अर्थात् स्वरूप जेनुं, [अहीं शरीर सामान्यनुं ग्रहण करवा छतां कार्मण