Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 67.

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समाधितंत्र११९
यस्य सस्पन्दमाभाति निःस्पन्देन समं जगत्
अप्रज्ञमक्रियाभोगं स शमं याति नेतरः ।।६७।।

टीकायस्मात्मनः सस्पन्दं परिस्पन्दसमन्वितं शरीरादिरूपं जगत् आभाति प्रतिभासते कथम्भूतं ? निःस्पन्देन समं निःसपन्देन काष्ठपाषाणादिना समं तुल्यं कुत स्तेन तत्समं ? अग्रज्ञं जडमचेतनं यतः तथा अक्रियाभोगं क्रियापदार्थपरिस्थितिः भोगः सुखाद्यनुभवः तौ न विद्येते यत्र यस्यैवं तत्प्रतिभासते स किं करोति ? स शमं याति शमं परमवीतरागतां संसारभोगदेहोपरि वा वैराग्यं गच्छति कथम्भूतं शमं ? अक्रियाभोगमित्येतदत्रापि सम्बंधनीयम् क्रिया वाक्कायमनोव्यापारः भोग इन्द्रियप्रणालिकया विषयानुभवनं विषयोत्सवः तौ न विद्येते यत्र

श्लोक ६७

अन्वयार्थ :(यस्य) जेने एटले जे ज्ञानी पुरुषने (सस्पन्दं जगत्) क्रियाओ चेष्टाओ करतुं (शरीरादिरूप) जगत (निःस्पन्देन समं) निःश्चेष्ट काष्ठपाषाणादि समान (अप्रज्ञं) चेतनारहित जड अने (अक्रियाभोगं) क्रिया अने सुखादि अनुभवरूप भोगथी रहित (आभाति) मालूम पडे छे, (सः) ते (अक्रियाभोगं शमं याति) मनवचनकायानी क्रियानी तथा इन्द्रियविषयभोगथी रहित एवा परम वीतरागतारूप शान्तिसुखने पामे छे; (इतरः न) बीजो कोई अर्थात् तेनाथी विलक्षण बहिरात्मा जीव उपरोक्त शान्तिसुखने पामतो नथी.

टीका :जे आत्माने (ज्ञानी आत्माने) सस्पंद एटले परिस्पन्दयुक्त (अनेक क्रियाओ करतुं) शरीरादिरूप जगत् लागे छेप्रतिभासे छे, केवुं (जगत)? निःस्पन्द (निश्चेष्ट) समान, अर्थात् काष्ठपाषाणादि समान एटले तुल्य निःस्पन्द (निश्चेष्ट). शाथी ते समान (भासे छे)? कारण के ते चेतनारहित जडअचेतन छे तथा अक्रियाभोग अर्थात् क्रिया एटले पदार्थोनी परिणति अने भोग एटले सुखादि अनुभवए बंनेनो जेमां अभाव छे, एवुं ते (जगत्) जेने प्रतिभासे छे ते शुं करे छे? ते शांति पामे छे, अर्थात् शम एटले परम वीतरागता अथवा संसार, भोग अने देह उपर वैराग्यतेने पामे छे. केवी शान्ति? अहीं पण तेनी (शमनी) साथे अक्रियाभोगनो संबंध लेवो. क्रिया एटले वाणी, काय अने मननो व्यापार अने भोग एटले इन्द्रियोनी प्रणालिकाथी (इन्द्रियोद्वारा) विषयोनुं अनुभवन एटले विषयोत्सवते बंने जेमां विद्यमान न होय एवी शान्तिने पामे छे. बीजो कोई नहि, अर्थात्

सक्रिय जग जेने दीसे जड अक्रिय अणभोग,
ते ज लहे छे प्रशमने, अन्ये नहि तद्योग. ६७.