Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११८समाधितंत्र

टीकारक्ते वस्त्रे प्रावृते सति आत्मानं यथा बुधो न रक्तं मन्यते तथा स्वदेहेऽपि कुंकुमादिना रक्ते आत्मानं रक्तं न मन्यते बुधः ।।६६।।

एवं शरीरादिभिन्नमात्मानं भावयतोऽन्तरात्मनः शरीरादेः काष्ठादिना तुल्यताप्रतिभासे मुक्तियोग्यता भवतीति दर्शयन्नाह

श्लोक ६६

अन्वयार्थ :(यथा) जेवी रीते (वस्त्रे रक्ते) पहेरेलुं वस्त्र लाल होवा छतां (बुधः) डाह्यो माणस (आत्मानं) पोतानेपोताना शरीरने (रक्तं न मन्यते) लाल मानतो नथी, (तथा) तेवी रीते (स्वदेहे अपि रक्ते) पोतानुं शरीर लाल होवा छतां (बुधः) अन्तरात्मा (आत्मानं) आत्माने (रक्तं न मन्यते) लाल मानतो नथी.

टीका :जेम लाल वस्त्र पहेरवा छतां, डाह्यो पुरुष पोताने (पोताना शरीरने) लाल मानतो नथी, तेम पोतानो देह कुंकुमादिथी लाल थवा छतां अन्तरात्मा आत्माने लाल मानतो नथी.

भावार्थ :जेम पहेरेला लाल वस्त्रथी शरीर लाल थतुं नथी, तेम पोतानुं शरीर कुंकुमादिथी लाल थतां, आत्मा कांई लाल वर्णनो थतो नथी.

जेम लाल वस्त्र अने शरीर भिन्न भिन्न छे, तेम लाल वर्णवाळुं शरीर अने आत्मा पण भिन्न भिन्न छे.

आत्मा रस, वर्ण, गंध अने स्पर्श रहित छे, छतां शरीर साथे एकताबुद्धि होवाने लीधे, अज्ञानी शरीरनो जेवो वर्ण होय तेवा वर्णनो आत्माने (पोताने) पण मानी राग द्वेष करे छे.

ज्ञानीने आत्मस्वरूपनुं भान छे, तेथी तेने शरीरना कोई पण वर्णथी रागद्वेष थतो नथीअर्थात् पोतानुं के परनुं सुंदर वर्णवाळुं शरीर जोईने ते खुश थतो नथी के अणगमता वर्णवाळुं शरीर जोईने नाखुश थतो नथी, ते जाणे छे के रूप, रस, गंधादि पुद्गलना धर्म छे, आत्माना धर्म नथी. आत्मा तो निरंजन, निराकार, अरूपी, अतीन्द्रिय अने स्वसंवेदन गम्य छे. ६६.

ए रीते शरीरादिथी भिन्न आत्मानी भावना करनार अंतरात्माने, शरीरादि काष्ठादि समान प्रतिभासतां, मुक्तिनी योग्यता थाय छेएम बतावीने कहे छेः १. नथी वर्ण जीवने, गंध नहि, नहि स्पर्श, रस जीवने नहीं,

नहि रूप के न शरीर, न संस्थान संहनने नहीं. (५०)
श्री समयसारगु. आवृत्तिगा. ५०