Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 66.

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समाधितंत्र११७
रक्ते वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न रक्तं मन्यते तथा
रक्ते स्वदेहेप्यात्मानं न रक्तं मन्यते बुधः ।।६६।।

शरीर अने आत्मानो संयोग संबंध छे, छतां अज्ञानीने ते बंनेनी एकताबुद्धि होवाथी ते शरीरना वियोगथी (नाशथी) पोताना आत्मानो नाश माने छे अने तेना संयोगथी पोताना आत्मानी उत्पत्ति माने छे. कह्युं छे केः

‘तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश जान.’

मिथ्याद्रष्टि शरीरनी उत्पत्तिने आत्मानो जन्म माने छे अने शरीरना नाशने आत्मानो नाश माने छे.

विशेष

शरीरमां आत्मबुद्धि होवाथी तेने आवी ऊंधी मान्यता होय छे. परना शरीर संबंधी पण तेने आवो ज भ्रम होय छे. स्त्री के पुत्रना शरीरनो नाश थतां, तेना आत्मानो नाश मानी ते दुःखी थाय छे.

‘‘......जेम कोई नवीन वस्त्र पहेरे, केटलोक काळ ते रहे, ते पछी तेने छोडी कोई अन्य नवीन वस्त्र पहेरे, तेम जीव पण नवीन शरीर धारण करे, ते केटलोक काळ धारण करी रहे पछी तेने पण छोडी अन्य नवीन शरीर धारण करे छे. माटे शरीर संबंधनी अपेक्षाए, जन्मादिक छे. जीव पोते जन्मादिक रहित नित्य छे, तो पण मोही जीवने भूत भविष्यनो विचार न होवाथी पर्यायमात्र ज पोतानुं अस्तित्व मानी पर्याय संबंधी कार्योमां ज तत्पर रह्या करे छे.....’’

ज्ञानीने शरीर अने आत्मानुं भेदज्ञान छे, तेथी शरीरना नाश वखते व्याकुल थतो नथी. कदाचित् अस्थिरताने लीधे अल्प व्याकुलता थाय, पण श्रद्धा अने ज्ञानमां ते एवो द्रढ छे के शरीरना नाशथी आत्मानो नाश कदी मानतो नथी अने आकुलतानो स्वामी थतो नथी. ६५.

रत्तें वत्थें जेम बुहु देहु ण मण्णइरत्तु
देहिं रत्तिं णाणि तहँ अप्पुण मण्णइ रत्तु ।। (२-१७८)परमात्मप्रकाश योगीन्दुदेवः

१. जुओश्री दौलतरामजी कृत ‘छहढाला’//५. २.मोक्षमार्ग प्रकाशकगु. आवृत्ति पृ. ४७.

रक्त वस्त्रथी जे रीते रक्त गणे न शरीर,
रक्त देहथी ज्ञानीजन रक्त न माने जीव. ६६.