११६समाधितंत्र
टीका — प्रावृत्ते वस्त्रे नष्टे सति आत्मानं यथा नष्टं बुधो न मन्यते तथा स्वदेहेऽपि विनष्टे कुतश्चित्कारणाद्विनाशं गते आत्मानं न नष्टं मन्यते बुधः ।।६५।। जाणे छे अने माने छे; तेथी शरीरनी प्रतिकूळतामां पण तेनी आत्म – प्रवृत्ति चालु ज होय छे.
अज्ञानीने शरीर साथे एकताबुद्धि होवाथी शरीरनी प्रतिकूळतामां ते आत्महित माटे पोताने असमर्थ समजे छे. ते तो एम ज माने छे के शरीर स्वस्थ होय – नीरोगी होय तो ज धर्म थाय, जीर्ण के रोगग्रस्त शरीरे धर्म न थाय. ए एनो भ्रम छे. ६४.
अन्वयार्थ : — (यथा) जेवी रीते (वस्त्रे नष्टे) वस्त्रनो नाश थतां (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (आत्मानं) पोताने एटले पोताना शरीरने (नष्टं न मन्यते) नाश थयेलुं मानतो नथी, (तथा) तेवी रीते (बुधः) अन्तरात्मा (स्वदेहे अपि नष्टे) पोताना देहनो नाश थवा छतां (आत्मानं) (नष्टं न मन्यते) नाश थयेलो मानतो नथी.
टीका : — जेम पहेरेलुं वस्त्र नाश पामवा छतां, डाह्यो पुरुष पोतानो (पोताना शरीरनो) नाश मानतो नथी, तेम पोतानो देह नाश पामतां अर्थात् कोई कारणे तेनो विनाश थतां, अन्तरात्मा आत्माने नाश थयेलो मानतो नथी.
भावार्थ : — जेम पहेरेलुं वस्त्र नाश पामतां, डाह्यो माणस पोताना शरीरने नाश थयेलुं मानतो नथी, तेम शरीर नाश पामतां अंतरात्मा पोताना आत्माने नाश पामेलो मानतो नथी.
जेम वस्त्र अने शरीर भिन्न भिन्न छे, तेम शरीर अने आत्मा पण एकबीजाथी भिन्न छे. ✽