Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 74.

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१२८समाधितंत्र

अनात्मदर्शिनो दृष्टात्मनश्च फलं दर्शयन्नाह
देहान्तरगतेर्बीजं देहेऽस्मिन्नात्मभावना
बीजं विदेहनिष्पत्तेरात्मवात्मभावना ।।७४।।

टीकादेहान्तरे भवान्तरे गतिर्गमनं तस्य बीजं कारणं किं ? आत्मभावना क्व ? वननिवास माटे प्रेम होतो नथी अने तेमनुं चित्त संकल्पोविकल्पोथी आकुलित होतुं नथी. तेओ ग्राम के वनने पोताना आत्मस्वरूपथी बहिर्भूत समजे छे; तेथी कोईमां पण आसक्ति राखवी के तेने पोतानुं निवासस्थान मानवुं ए तेमने इष्ट नथी. तेओ तो शुद्धात्मस्वरूपने ज पोतानी विहारभूमि बनावे छे अने तेमां ज सदा रम्या करे छे.

‘‘चटाई, पत्थर, घास, जमीन, लाकडानुं पाटियुं वगेरे ध्यान माटे निस्सार छे, कारण के जेणे रागद्वेष अने विषयकषायरूपी शत्रुओने दूर कर्या छे तेवा पुरुषने तो तेनो आत्मा ज ध्यान माटे साचुं अत्यंत निर्मळ आसन छेएवुं ज्ञानीजनोए मान्युं छे’’

आत्मस्वरूपना अनुभव माटे ग्रामअरण्यनी जेम अन्य पर पदार्थो पण निस्सार छे; त्रिकाली शुद्धात्मानुं अवलंबन ज सारभूत छे. ७३.

अनात्मदर्शी अने आत्मदर्शीना फलने दर्शावी कहे छेः

श्लोक ७४

अन्वयार्थ : (अस्मिन् देहे) आ शरीरमां (आत्मभावना) आत्मानी भावना अर्थात् शरीरने ज आत्मा मानवो ते (देहान्तरगतेः) अन्य शरीरग्रहणरूप भवान्तरप्राप्तिनुं (बीजं) बीज एटले कारण छे अने (आत्मनि एव) आत्मामां ज (आत्मभावना) आत्मानी भावना अर्थात् आत्माने ज आत्मा मानवो ते (विदेहनिष्पत्तेः) शरीरना सर्वथा त्यागरूप मुक्तिनुं(बीजं) बीज छे.

टीका : अन्य देहमां एटले अन्य भवमां गति एटले गमनतेनुं बीज एटले १. न संस्तरोऽश्मा न तृणं न मेदिनी, विधानतो नो फलको विनिर्मितः

यतो निरस्ताक्षकषायविद्विषः, सुधीभिरात्मैव सुनिर्मलो मतः ।।२२।।
(श्री अमितगति आचार्यकृत ‘समायिक पाठ’)
देहे आतम-भावना देहान्तरगति-बीज;
आत्मामां निज-भावना देहमुक्तिनुं बीज. ७४.