देहेऽस्मिन् अस्मिन्कर्मवशाद्गृहीते देहे । विदेहनिष्पत्तेः विदेहस्य सर्वथा देहत्यागस्य निष्पत्तेर्मुक्तिप्राप्तेः पुनर्बीजं स्वात्मन्येवात्मभावना ।।७४।।
तर्हि मुक्तिप्राप्तिहेतुः क श्चिद्गुरुर्भविष्यतीति वदन्तं प्रत्याह – कारण. क्युं? आत्मभावना. शामां? आ देहमां एटले कर्मवश ग्रहेला आ देहमां. विदेहनिष्पत्तिनुं – विदेहनी अर्थात् सर्वथा देहत्यागनी निष्पत्तिनुं एटले मुक्ति प्राप्तिनुं बीज पोताना आत्ममां ज आत्मभावना (करवी ते) छे.
भावार्थ : शरीरमां आत्मबुद्धि करवाथी एटले शरीरने ज आत्मा मानवाथी अन्य भवमां पण शरीरनी ज प्राप्ति थाय छे अने पोताना आत्मामां ज – निज स्वरूपमां ज आत्मबुद्धि करवाथी अर्थात् आत्माने ज आत्मा मानवाथी मुक्ति थाय छे – देहनो संबंध सर्वथा छूटी जाय छे.
माटे फरीथी शरीरनी प्राप्ति न थाय — पुनर्भव करवो न पडे ते माटे ज्ञानीए शरीरमां आत्मबुद्धिनो त्याग करीने पोताना आत्मामां ज आत्म-भावना करवी ए ज योग्य छे.
‘‘ज्यां सुधी देहप्रधान विषयोमां ममत्व छोडतो नथी, त्यां सुधी कर्मथी मलिन आत्मा फरी फरीने अन्य अन्य प्राणो धारण करे छे.’’१
‘‘जे इन्द्रियादिनो विजयी थईने उपयोगमात्र आत्माने ध्यावे छे ते कर्मो वडे रंजित थतो नथी; तेने प्राणो कई रीते अनुसरे? (अर्थात् तेने प्राणोनो संबंध थतो नथी.)’’२
‘‘जे अज्ञानी जीव (शरीरादिक) पुद्गल द्रव्यने अभिनंदे छे — अर्थात् तेने पोतानुं माने छे – तेमां आत्मीय भाव करे छे, ते जीवनी साथे संयोग-संबंध चारे गतिओमां ते पुद्गल द्रव्य छोडतुं नथी.’’३ ७४
तो मुक्ति-प्राप्तिनो हेतु कोई गुरु हशे — एवुं बोलनार प्रति कहे छे. १. कर्मे मलिन जीव त्यां लगी प्राणो धरे छे फरी फरी,
२. करी इन्द्रियादिक-विजय, ध्यावे आत्मने-उपयोगने,
३. ‘इष्टोपदेश’ – श्लोक ४६