Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र१२९

देहेऽस्मिन् अस्मिन्कर्मवशाद्गृहीते देहे विदेहनिष्पत्तेः विदेहस्य सर्वथा देहत्यागस्य निष्पत्तेर्मुक्तिप्राप्तेः पुनर्बीजं स्वात्मन्येवात्मभावना ।।७४।।

तर्हि मुक्तिप्राप्तिहेतुः क श्चिद्गुरुर्भविष्यतीति वदन्तं प्रत्याह कारण. क्युं? आत्मभावना. शामां? आ देहमां एटले कर्मवश ग्रहेला आ देहमां. विदेहनिष्पत्तिनुंविदेहनी अर्थात् सर्वथा देहत्यागनी निष्पत्तिनुं एटले मुक्ति प्राप्तिनुं बीज पोताना आत्ममां ज आत्मभावना (करवी ते) छे.

भावार्थ : शरीरमां आत्मबुद्धि करवाथी एटले शरीरने ज आत्मा मानवाथी अन्य भवमां पण शरीरनी ज प्राप्ति थाय छे अने पोताना आत्मामां जनिज स्वरूपमां ज आत्मबुद्धि करवाथी अर्थात् आत्माने ज आत्मा मानवाथी मुक्ति थाय छेदेहनो संबंध सर्वथा छूटी जाय छे.

माटे फरीथी शरीरनी प्राप्ति न थायपुनर्भव करवो न पडे ते माटे ज्ञानीए शरीरमां आत्मबुद्धिनो त्याग करीने पोताना आत्मामां ज आत्म-भावना करवी ए ज योग्य छे.

विशेष

‘‘ज्यां सुधी देहप्रधान विषयोमां ममत्व छोडतो नथी, त्यां सुधी कर्मथी मलिन आत्मा फरी फरीने अन्य अन्य प्राणो धारण करे छे.’’

‘‘जे इन्द्रियादिनो विजयी थईने उपयोगमात्र आत्माने ध्यावे छे ते कर्मो वडे रंजित थतो नथी; तेने प्राणो कई रीते अनुसरे? (अर्थात् तेने प्राणोनो संबंध थतो नथी.)’’

‘‘जे अज्ञानी जीव (शरीरादिक) पुद्गल द्रव्यने अभिनंदे छेअर्थात् तेने पोतानुं माने छेतेमां आत्मीय भाव करे छे, ते जीवनी साथे संयोग-संबंध चारे गतिओमां ते पुद्गल द्रव्य छोडतुं नथी.’’ ७४

तो मुक्ति-प्राप्तिनो हेतु कोई गुरु हशेएवुं बोलनार प्रति कहे छे. १. कर्मे मलिन जीव त्यां लगी प्राणो धरे छे फरी फरी,

ममता शरीरप्रधान विषये ज्यां लगी छोडे नहीं. (१५०)
(श्री प्रवचनसारगुज. आवृत्ति गाथा १५०)

२. करी इन्द्रियादिक-विजय, ध्यावे आत्मने-उपयोगने,

ते कर्मथी रंजित नहि, क्यम प्राण तेने अनुसरे? (१५१)
(श्री प्रवचनसारगुज. आवृत्तिगाथा १५१)

३. ‘इष्टोपदेश’श्लोक ४६