Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 75.

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१३०समाधितंत्र

नयत्यात्मानमात्मैव जन्म निर्वाणमेव च
गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थतः ।।७५।।

टीकाजन्म संसारं नयति प्रापयति कं ? आत्मानं कोऽसौ ? आत्मैव देहादौ दृढात्मभावनावशात् निर्वाणमेव च आत्मानमात्मैव नयति स्वात्मन्येवात्मबुद्धिप्रकर्षसद्भावात् यत एवं तस्मात् परमार्थतो गुरुरात्मात्मनः नान्यो गुरुरस्ति परमार्थतः व्यवहारेण तु यदि भवति तदा भवतु ।।७५।।

श्लोक ७५

अन्वयार्थ : (आत्मा एव) आत्मा ज (आत्मानं) आत्माने (जन्म निर्वाणम् एव च नयति) जन्म अने निर्वाण प्रति दोरे छेअर्थात् प्राप्त करावे छे; (तस्मात्) माटे (परमार्थतः) निश्चयथी (आत्मनः गुरुः) आत्मानो गुरु (आत्मा एव) आत्मा ज छे; (अन्यः न अस्ति) बीजो कोई नहि.

टीका :जन्म एटले संसार प्रति दोरे छेप्राप्त करावे छे. कोने? आत्माने. कोण ते? देहादिमां द्रढ आत्मभावनावश आत्मा ज (जन्म प्राप्त करावे छे); अने पोताना आत्मामां ज आत्मबुद्धिना प्रकर्ष सद्भावथी आत्मा ज आत्माने निर्वाण प्रति लई जाय छे, कारण के वास्तवमां आत्मा आत्मानो गुरु छे; परमार्थे बीजो कोई गुरु नथी. व्यवहारे ते होय तो भले हो.

भावार्थ :जे आत्मा देहादिमां द्रढ आत्मबुद्धि करे छे ते जन्ममरणरूप संसारमां भ्रमण करे छेअर्थात् आत्मा ज पोताना आत्माने स्वअपराधथी संसारमां रखडावे छे, अने ते ज आत्मा जो पोताना आत्मामां ज द्रढ आत्मबुद्धि करे, तो ते संसारभ्रमणथी मुक्त थाय छेनिर्वाण पामे छेअर्थात् आत्मा ज पोताना आत्माने निर्वाण पमाडे छे; तेथी परमार्थे आत्मा ज आत्मानो गुरु छे, बीजो कोई गुरु नथी.

विशेष

अहीं आचार्ये स्पष्ट कर्यु छे के जीव पोताना शुद्ध के अशुद्ध उपादानथी ज पोताना आत्मानुं हितअहित करे छे. तेमां कर्म के पर पदार्थो अहेतुवत् छे अकिंचित्कर छे.

जीव ज पोताने करे जन्म तथा निर्वाण;
तेथी निज गुरु निश्चये जीव ज, अन्य न जाण. ७५.