ज्यां सुधी जीव पोताना आत्माना सामर्थ्यनुं भान करी अंतरंग रागादि शत्रुओ अर्थात् कषायपरिणति पर विजय प्राप्त करी स्वयं पोताना आत्मानो उद्धार करवानो प्रयत्न करतो नथी, त्यां सुधी ते संसाररूपी कीचडमां फस्यो रहे छे अने जन्ममरणनां असह्य कष्टो भोगवतो रहे छे, परंतु ज्यारे ते आत्मस्वरूपनुं बराबर ज्ञान करी स्वभाव – सन्मुख विशेष उग्र पुरुषार्थ आदरे छे, त्यारे क्रमे क्रमे राग – द्वेषादि कषाय – भावोनो या विभाव परिणतिनो स्वयं त्याग थई जाय छे अने रागादि भावथी सर्वथा मुक्त थतां अर्थात् परम वीतरागता प्राप्त थतां ते मोक्ष पामे छे.
‘आत्मा, पोताना आत्मामां मोक्षसुखनी सदा अभिलाषा करे छे, अभीष्ट मोक्षसुखनुं ज्ञान करावे छे अने स्वयं कल्याणकारी आत्म – सुखनी प्राप्तिमां पोताने योजे छे, तेथी आत्मा ज आत्मानो गुरु छे.१
माटे आत्मा परनुं – निमित्तनुं अवलंबन छोडी पोते पोतानो गुरु बने अर्थात् धर्मनी सिद्धि माटे स्वाश्रयी बने, तो ते जन्म – मरणनां दुःखोथी मुक्त थई निर्वाण पामे. ७५.
देहमां आत्मबुद्धि करनार (बहिरात्मा) मरण नजीक आवता शुं करे छे? ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (देहादौ दृढात्मबुद्धिः)देहादिमां द्रढ आत्मबुद्धिवाळो बहिरात्मा (आत्मनः नाशं) पोताना एटले पोताना शरीरना नाशने (च) अने (मित्रादिभिः वियोगं) मित्रादिथी थता वियोगने (उत्पश्यन्) देखीने (मरणात्) मरणथी (भृशम्) अत्यंत (बिभेति) डरे छे. १. स्वस्मिन्सदाभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः ।