१३२समाधितंत्र
टीका — देहादौ दृढात्मबुद्धिरविचलात्मदृष्टिर्बहिरात्मा । उत्पश्यन्नवलोकयन् । आत्मनो नाशं मरणं मित्रादिभिर्वियोगं च मम भवति इति बुद्ध्यमानो मरणाद्बिभेति भृशमत्यर्थम् ।।७६।।
यस्तु स्वात्मन्येवात्मबुद्धिः स मरणोपनिपाते किं करोतीत्याह —
टीका : — देहादिना द्रढ आत्मबुद्धिवाळो एटले अविचल आत्मद्रष्टिवाळो बहिरात्मा, पोतानो नाश एटले मरण जोईने – अवलोकीने तथा ‘मित्रादिथी मारो वियोग थशे’ एम समजीने मरणथी अत्यंत भय पामे छे; एवो अर्थ छे.
भावार्थ : — अज्ञानी जीव शरीरने ज द्रढपणे आत्मा माने छे, तेथी शरीर छूटवाना समये अर्थात् मरण समये पोताना आत्मानो नाश अने तेथी करीने स्त्री – पुत्र – मित्रादिथी वियोग – ए बे वात जाणी मरणथी घणो ज भय पामे छे.
जे पुरुषोनुं चित्त संसारमां आसक्त छे, तेमने माटे मृत्यु भयनुं कारण छे. कारण के ते माने छे के ‘मारा शरीरनो नाश थतां, स्त्री – पुत्रादिथी वियोग थशे. हवे मने तेमना संयोगनुं सुख मलशे नहि.’ आवा वियोगना दुःखथी ते मरणथी बहु बीवे छे. ७६.
परंतु जेने पोताना आत्ममां ज आत्मबुद्धि छे ते मरण नजीक आवतां शुं करे छे? ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (आत्मनि एव आत्मधीः) आत्मस्वरूपमां आत्मबुद्धिवाळो (शरीरगतिं) शरीरनी गतिने – शरीरना विनाशने (आत्मनः अन्यां) आत्माथी भिन्न (मन्यते) माने छे अने (वस्त्रं त्यक्त्वा वस्त्रान्तरग्रहम् इव) मरणना अवसरने एक वस्त्रने छोडी बीजा वस्त्रनुं ग्रहण करवानी जेम समजी (निर्भयं मन्यते) पोताने निर्भय माने छे.