टीका — आत्मन्येवात्मस्वरूप एव आत्मधीः अन्तरात्मा शरीरगतिं शरीरविनाशं शरीरपरिणतिं वा बालाद्यवस्थारूपां आत्मनो अन्यां भिन्ना निर्भयं यथा भवत्येवं मन्यते । शरीरोत्पादविनाशौ आत्मनो विनाशोत्पादौ (उत्पादविनाशौ इति साधुः) न मन्यत इत्यर्थः । वस्त्रं त्यक्त्वा वस्त्रान्तरग्रहणमिव ।।७७।।
टीका : — आत्मामां ज एटले आत्मस्वरूपमां ज आत्मबुद्धिवाळो – अंतरात्मा, शरीरनी गतिने एटले शरीरना विनाशने अथवा बालादि अवस्थारूप शरीरनी परिणतिने निर्भयपणे (निःशंकपणे) आत्माथी अन्य – भिन्न माने छे, शरीरना उत्पाद – विनाशने आत्मानो उत्पाद – विनाश ए मानतो नथी – एवो अर्थ छे, जेम वस्त्रनो त्याग करीने अन्य वस्त्रनुं ग्रहण करवुं तेम.
भावार्थ : — अंतरात्मा आत्माने शरीरथी भिन्न समजे छे, बंनेने एकरूप मानतो नथी, तेथी ते शरीरनी अवस्थाने आत्मानी अवस्था मानतो नथी, अर्थात् शरीरनी उत्पत्तिथी आत्मानी उत्पत्ति अने शरीरना नाशथी आत्मानो नाश मानतो नथी. जेम एक वस्त्र तजी बीजुं वस्त्र ग्रहण करतां शरीरने कांई थतुं नथी, तेम एक देह तजी बीजो देह धारण करतां आत्माने कांई थतुं नथी – एम समजी ते मरण – समये निर्भय रहे छे, मरणथी डरतो नथी.
ज्ञानी समजे छे के जेम मकाननो नाश थतां तेमां व्यापेला आकाश द्रव्यनो नाश थतो नथी, तेम शरीरनो नाश थतां तेमां रहेला आत्मानो कदी नाश थतो नथी. आवी समजणने लीधे तेने कोई पण प्रकारनी आकुलता रहेती नथी. ते मरण – प्रसंगे निर्भयता सेवे छे अने आत्मस्वरूपमां मग्न रहे छे.
ज्ञानी मरण समये वधु द्रढता माटे पोताना आत्माने उद्देशीने कहे छे केः —
‘हे आत्मन्, तुं तो ज्ञानरूपी दिव्य शरीरनो धारी छे, माटे सेंकडो कीडोना समूहथी भरेला आ जीर्ण – शीर्ण शरीररूपी पींजराना नाश समये तने भय करवो उचित नथी.’
‘हे आत्मन्, आ मृत्युरूप महोत्सव प्राप्त थवाथी तुं केम डरे छे? कारण के आ मृत्यु द्वारा तो तुं ज्ञानादिक स्वरूपमां स्थित रहीने अन्य शरीररूप नवा नगर तरफ गमन करे छे.’
‘गर्भथी लई आज सुधी, देह पींजरामां तुं अनेक प्रकारनां दुःख भोगवतो पड्यो रह्यो छे. मृत्युरूपी बलवान राजा सिवाय बीजो कोण तने आ देह – पींजरामांथी मुक्त करी शके तेम छे?’