१३४समाधितंत्र
टीका — व्यवहारे विकल्पाभिधानलक्षणेप्रवृत्तिनिवृत्यादिस्वरूपे वा सुषुप्तोऽप्रयत्नपरो यः स जागर्त्यात्मगोचरे आत्मविषये संवेदनोद्यतो भवति । यस्तु व्यवहारेऽस्मिन्नुक्तप्रकारे जागर्ति स सुषुप्तः आत्मगोचरे ।।७८।।
‘जे पुरुषे, मृत्युरूपी कल्पवृक्ष प्राप्त थवा छतां, पोताना आत्मानुं हित साध्युं नहि, ते संसाररूपी कादवमां फरी फसाई जई पोतानुं शुं कल्याण करशे?’१
आवा विचारथी ज्ञानी मरणथी भय पामतो नथी, पण मरणने ते मित्र समान गणे छे, तेने एक महोत्सव तरीके लेखे छे, अने तेथी ते निराकुलतापूर्वक आत्मस्वरूपमां स्थिर थई समाधि – मरण साधे छे. ७७.
आवुं ज्ञान तेने ज थाय के जे व्यवहार विशे अनादर राखे छे, परंतु जेने त्यां (व्यवहारमां) आदर छे तेने आवुं ज्ञान थतुं नथी. ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (यः) जे (व्यवहारे) व्यवहारमां (सुषुप्तः) सूतेलो छे, (सः) ते (आत्मगोचरे) आत्माना विषयमां (जागर्ति) जागे छे (च) अने जे (अस्मिन् व्यवहारे) आ व्यवहारमां (जागर्ति) जागे छे ते (आत्मगोचरे) आत्माना विषयमां (सुषुप्तः) सूतेलो छे.
टीका : — व्यवहारमां एटले विकल्प नाम जेनुं लक्षण छे तेमां (‘विकल्पना स्थानरूप’) अर्थात् प्रवृत्ति – निवृत्ति – आदिस्वरूप (व्यवहारमां) जे सूतो छे – प्रयत्नपरायण नथी, ते आत्मदर्शनमां एटले आत्मविषयमां जागे छे अर्थात् संवेदनमां (आत्मानुभवमां) तत्पर होय छे, पण जे आ उक्त प्रकारना व्यवहारमां जागे छे ते आत्म – विषयमां सूतो छे. (अर्थात् आत्मदर्शन पामतो नथी.) ✽
१. ‘मृत्युमहोत्सव’ – श्लोक ९, १०, १२, १४.