भावार्थ : — ज्ञानी, प्रवृत्ति – निवृत्तिरूप सांसारिक कार्योमां अनासक्त तेम ज अप्रयत्नशील होय छे अने आत्मानुभवना कार्यमां सजाग रहे छे – तत्पर रहे छे, ज्यारे अज्ञानी प्रवृत्ति – निवृत्तिरूप संसारनां कार्योमां प्रयत्नशील रहे छे – जागृत रहे छे अने आत्मानुभवना कार्यमां अतत्पर रहे छे.
अहीं आचार्ये ए बताव्युं छे के प्रवृत्ति – निवृत्तिरूप व्यवहारमां – अर्थात्, अहिंसा, भक्ति, व्रत, नियमादि शुभ प्रवृत्तिरूप व्यवहारमां अने हिंसा, जूठ, चोरी, आदि अशुभ कार्यथी निवृत्तिरूप व्यवहारमां – एम बन्ने व्यवहारोमां जे अतत्पर होय छे ते ज आत्मानुभव करी शके छे. परंतु भक्ति आदि शुभ कार्योमां प्रवृत्तिथी अने अशुभ कार्यमां निवृत्तिथी आत्मस्वरूपनी प्राप्ति थती नथी, कारण के ते प्रवृत्ति विकल्पारूढ छे – रागयुक्त छे. राग भले शुभ होय तो पण तेनाथी आत्मज्ञान थतुं नथी.
ज्ञानी तो आत्मस्वरूपमां स्थिरतारूप प्रवृत्ति करे छे, तेथी तेने व्यवहार धर्मथी स्वयं निवृत्ति थई जाय छे. तेनी ते प्रवृत्ति विकल्पारूढ नथी, पण निर्विकल्प छे अने तेनाथी धर्म थाय छे.
ज्ञानीने अस्थिरताने लीधे कदाचित् पूजा – भक्ति आदिनो शुभ राग आवे, पण ते तेने भलो मानतो नथी, तेने तेनुं स्वामीत्व के कर्ताबुद्धि नथी. तेने ते राग हेयबुद्धिए वर्ते छे; तेथी तेमां तेनी प्रवृत्ति देखावा छतां ते वास्तवमां निवृत्तिमय ज छे.
अज्ञानी शुभरागमय प्रवृत्तिने धर्म मानी तेनाथी संतुष्ट थाय छे अने आत्मस्वरूपनी भावना माटे अतत्पर होय छे.
‘‘वळी कोई जीव भक्तिने मोक्षनुं कारण जाणी तेमां अति अनुरागी थई प्रवर्ते छे, पण ते तो जेम अन्यमती भक्तिथी मुक्ति माने छे तेवुं आनुं पण श्रद्धान थयुं; भक्ति तो रागरूप छे अने रागथी बंध छे, माटे ते मोक्षनुं कारण नथी. रागनो उदय आवतां जो भक्ति न करे तो पापानुराग थाय, एटला माटे अशुभ राग छोडवा अर्थे ज्ञानी भक्तिमां प्रवर्ते छे. वा मोक्षमार्गमां बाह्य निमित्तमात्र पण जाणे छे, परंतु त्यां ज उपादेयपणुं मानी संतुष्ट थतो नथी, पण शुद्धोपयोगनो उद्यमी रहे छे.....’’१ १. मोक्षमार्गप्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. २२७.