१३८समाधितंत्र
टीका — पूर्वं प्रथमं दृष्टात्मतत्त्वस्य देहाद्भेदेन प्रतिपन्नात्मस्वरूपस्य प्रारब्धयोगिनः विभात्युन्मत्तवज्जगत् स्वरूपचिंतनविकलत्वाच्छुभेतरचेष्टायुक्तमिदं जगत् नाना – बाह्यविकल्पैरूपेतमुन्मत्तमिव प्रतिभासते । पश्चान्निष्पन्नयोगावस्थायां सत्यां स्वभ्यस्तात्मधियः सुष्टुभावितमात्मस्वरूपं येन तस्य निश्चलात्मस्वरूपमनुभवतो जगद्विषयचिन्ताभावात् काष्ठपाषाणवत्प्रतिभाति । तत्र परमौदासीन्यावलम्बात् ।।८०।। (दृष्टात्मतत्त्वस्य) जेने आत्मदर्शन थयुं छे एवा अंतरात्माने (जगत्) जगत् (उन्मत्तवत्) उन्मत्त जेवुं – पागल जेवुं (विभाति) जणाय छे, अने (पश्चात्) पछीथी अर्थात् योगनी परिपक्व अवस्थामां, (स्वभ्यस्तात्मधियः) आत्मस्वरूपना अभ्यासमां परिपक्वबुद्धिवाळा अंतरात्माने आ (काष्ठपाषाणरूपवत्) काष्ठ – पाषाण जेवुं (निश्चेष्ट) भासे छे.
टीका : — प्रथम, जेणे आत्म – तत्त्व जाण्युं छे अर्थात् देहथी आत्मस्वरूप भिन्न छे एवुं जेने प्रथम ज्ञान थयुं छे तेवा योगनो आरंभ करनार योगीने जगत् उन्मत्त जेवुं (पागल जेवुं) लागे छे – अर्थात् स्वरूप – चिंतनना विकलपणाने लीधे शुभ – अशुभ चेष्टायुक्त आ जगत् विविध बाह्य विकल्पयुक्त, उन्मत्त जेवुं लागे छे. पछीथी ज्यारे योगनी परिपक्व अवस्था थाय, त्यारे जेने आत्मबुद्धिनो सारो अभ्यास थयो छे अर्थात् जेणे आत्मस्वरूपनी सारी पेठे भावना करी छे, तेवा निश्चल आत्मस्वरूपनो अनुभव करनारने, जगत् संबंधी चिंताना अभावने लीधे अर्थात् परम उदासीनपणाना अवलंबनने लीधे ते (जगत्) काष्ठ – पाषाणवत्) प्रतिभासे छे.
भावार्थ : — जेने स्व – परनुं भेदज्ञान थयुं छे तेवा अन्तरात्माने, आत्मानुभवनी प्रथम भूमिकामां अर्थात् योगना आरंभकालमां आ सचेष्ट अने विकल्पारूढ जगत् उन्मत्त जेवुं – पागल जेवुं लागे छे, परंतु बादमां ज्यारे ते योगना परिपक्व अभ्यासद्वारा आत्मस्वरूपमां स्थिर थई जाय छे, त्यारे तेने आ जगत् संबंधी बुद्धिपूर्वक कांई विकल्प ऊठतो नथी, कारण के तेने ते समये निर्विकल्प दशा वर्ते छे.
प्रथम भूमिकामां अर्थात् सविकल्प दशामां ज्ञानीनो उपयोग बाह्य पदार्थो तरफ जाय छे अने तेथी विविध विकलपो थाय छे, परंतु जेम जेम ते स्वरूप – स्थिरतानो अभ्यास वधारतो जाय छे, तेम तेम उपयोगनुं पर तरफनुं वलण छूटतुं जाय छे अने ते स्वरूपमां स्थिर थतो जाय छे. अभ्यासना बळे छेवटे आत्मस्वरूपमां उपयोगनी स्थिरता एटली जामे छे के तेने ते समये बाह्य जगत्नो बिलकुल विचार पण आवतो नथी.