Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 81.

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समाधितंत्र१३९

ननु स्वभ्यस्तात्मधियः इति व्यर्थम् शरीराद्भेदेनात्मनस्तस्वरूपविद्भ्यः श्रवणात्स्वयं वाऽन्येषां तत्स्वरूपप्रतिपादनान्मुक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह

श्रृण्वन्नप्यन्यतः कामं वदन्नपि कलेवशत्
नात्मानं भावयेद्भिन्नं यावत्तावन्न मोक्षमाक् ।।८१।।

टीकाअन्यत उपाध्यायपदेः कामं अत्यर्थं श्रृण्वन्नपि कलेवराद्भिन्नमात्मानमाकर्णयन्नपि ततो भिन्नं तं स्वयमन्यान् प्रति वदन्नपि यावत्कलेवराद्भिन्नमात्मानं न भावयेत् तावन्न मोक्षभाक् मोक्षभाजनं तावन्न भवेत् ।।८१।।

‘‘वळी जे ज्ञान पांच इन्द्रिय अने छठ्ठा मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं ते ज्ञान सर्व बाजुथी समेटाई निर्विकल्प अनुभवमां केवळ स्वरूपसन्मुख थयुं. केम के आ ज्ञान क्षयोपशमरूप छे, ते एक काळमां एक ज्ञेयने ज जाणी शके; हवे ते ज ज्ञान स्वरूप जाणवाने प्रवर्त्युं त्यारे अन्यने जाणवानुं सहेजे ज बंध थयुं. त्यां एवी दशा थई के बाह्य अनेक शब्दादिक विकार होवा छतां पण स्वरूपध्यानीने तेनी कांई खबर नथी......’’ ८०.

‘स्वभ्यस्तात्मधियः’ ए पद व्यर्थ छे, कारण के ‘शरीरथी आत्मा भिन्न छे’ तेवुं तेना स्वरूपना जाणनाराओ पासेथी सांभळवाथी अथवा स्वयं बीजाओने तेनुं स्वरूप समजाववाथी मुक्ति थई शके छेएवी आशंका करी कहे छेः

श्लोक ८१

अन्वयार्थ :आत्मानुं स्वरूप (अन्यतः) बीजा पासेथी (कामम्) बहु ज (शृण्वन् अपि) सांभळवा छतां तथा (कलेवरात्) मुखथी (वदन् अपि) बीजाओने कहेवा छतां पण (यावत्) ज्यां सुधी (आत्मानं) आत्माने (भिन्नं) शरीरादिथी भिन्न (न भावयेत्) भावे नहि, (तावत्) त्यां सुधी (मोक्षभाक् न) जीव मोक्षने पात्र थतो नथी.

टीका :बीजा पासेथी एटले उपाध्यायादि पासेथी बहु ज सांभळवा छतां अर्थात् शरीरथी आत्मा भिन्न छे एवुं श्रवण करवा छतां, तेनाथी (शरीरथी) ते (आत्मा) भिन्न छे एवुं स्वयं बीजाओ प्रति कहेवा छतां, ज्यां सुधी शरीरथी आत्मा भिन्न छे एवी भावना १. श्री मोक्षमार्ग प्रकाशकश्री टोडरमल्लजीनी रहस्यपूर्ण चिठ्ठीपृ ३४९ (गु. आवृति)

बहु सुणे भाखे भले देहभिन्ननी वात;
पण तेने नहि अनुभवे त्यां लगी नहि शिवलाभ. ८१.
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