१४०समाधितंत्र न करे, त्यां सुधी जीव मोक्षभाजन – मोक्षपात्र थई शके नहि.
भावार्थ : — ‘शरीरादिथी आत्मा भिन्न छे’ ए वात घणी वार गुरुमुखेथी सांभळे तथा बीजाओने तेवो उपदेश पण वारंवार आपे, छतां ज्यां सुधी आत्माने शरीरादिथी द्रढपणे भिन्न अनुभवे नहि अर्थात् ज्यां सुधी स्वसन्मुखतापूर्वक तेनुं तेने भाव – भासन थाय नहि, त्यां सुधी जीव मुक्ति लायक बनी शके नहि.
भेद – विज्ञान द्वारा स्वसन्मुखतापूर्वक जीव – अजीवादि तत्त्वोनुं भाव – भासन थवुं – साची प्रतीति थवी – ते ज निश्चय सम्यक्त्व छे, ते विन जीव मोक्षने पात्र थाय नहि.
‘‘वळी शास्त्रमां ‘तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’ (मोक्षशास्त्र अ. १ सूत्र २) एवुं वचन कह्युं छे, तेथी शास्त्रोमां जेम जीवादि तत्त्व लख्यां छे तेम पोते शीखी ले छे, त्यां ज उपयोग लगावे छे तथा अन्यने उपदेश आपे छे, परंतु पोताने तेनो ‘भाव भासतो’ नथी; अने त्यां तो ते वस्तुना भावनुं ज नाम तत्त्व कह्युं छे, एटले भाव भास्या विना तत्त्वार्थश्रद्धान क्यांथी होय?’’
‘‘वळी कोई वखत शास्त्रानुसार साची वात पण बतावे, परंतु त्यां अंतरंग निर्धाररूप श्रद्धान नथी; तेथी जेम केफी मनुष्य माताने माता पण कहे, तो पण ते शाणो नथी; तेम आने पण सम्यग्द्रष्टि कहेता नथी.’’
‘वळी जेम कोई बीजानी ज वातो करतो होय तेम आत्मानुं कथन करे छे, परंतु ‘ए आत्मा हुं ज छुं’ एवो भाव भासतो नथी. वळी जेम कोई बीजाने बीजाथी भिन्न बतावतो होय तेम आ आत्मा अने शरीरनी भिन्नता प्ररूपे छे, परंतु ‘हुं ए शरीरादिथी भिन्न छुं’ एवो भाव भासतो नथी......’’१
माटे ‘आत्मा शरीरथी भिन्न छे’ एवुं जाणवा छतां, जो तेनुं भाव – भासन न थाय अर्थात् अनुभवमां न आवे तो ते जाणवुं कार्यकारी नथी. ८१.
ते भावनामां प्रवृत्त थई तेणे (अंतरात्माए) शुं करवुं? ते कहे छेः — १. जुओ – मोक्षमार्ग प्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. २३०.
तावन्न मुच्यते यावन्न भेदाभ्यासनिष्ठितः ।। (ज्ञानार्णव)
निष्ठित (परिपक्व) थतो नथी त्यां सुधी ते मुक्ति पामतो नथी.