Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 84.

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समाधितंत्र१४३

हि लोहश्रृङ्खला बंधहेतुस्तथा सुवर्णश्रृङ्खलाऽपि अतो यथोभयश्रृंङ्खलाभावाद्व्यवहारे मुक्तिस्तथा परमार्थेऽपीति ततस्तस्मात्मोक्षार्थी अव्रतानीव इव शब्दो यथाऽर्थः यथाऽव्रतानि त्यजेत्तथा व्रतान्यपि ।।८३।।

कथं तानि त्यजेदिति तेषां त्यागक्रमं दर्शयन्नाह
अव्रतानि परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितः
त्याज्जेत्तान्यपि संप्राप्य परमं पदमात्मनः ।।८४।।

टीकाअव्रतानि हिंसादिनि प्रथमतः परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितो भवेत् पश्चात्तान्यपि त्यजेत् किं कृत्वा ? समप्राप्य किं तत् ? परमं पदं परमवीतरागतालक्षणं क्षीणकषायगुणस्थानं तेम परमार्थमां पण (पुण्यपापना अभावे मोक्ष छे). तेथी मोक्षना अर्थीए अव्रतोनी जेम [इव शब्द यथाना अर्थमां छे] व्रतोने पण छोडवां.

भावार्थ :मोक्षमार्गमां हिंसादि पांच अव्रतभावोनी जेम पांच अहिंसादि व्रतभावो पण बाधक छे, कारण के अव्रतभाव ते अशुभ भाव छे, ते पापबंधनुं कारण छे अने व्रतभाव ते शुभ भाव छे, ते पुण्यबंधनुं कारण छे; बंने बंधना कारण छे. पुण्य अने पाप ए बंनेनो नाश थाय त्यारे ज मुक्ति थाय छे. माटे मोक्षार्थीए लोढा अने सोनानी बेडीनी जेम अव्रतभावोनो तेम ज व्रतभावोनो पण त्याग करवो जोईए.

पुण्य अने पापबंने विभाव परिणतिथी उपज्या होवाथी बंने बंधरूप ज छे; बंने संसारनुं कारण होई एकरूप ज छे. माटे मोक्षार्थीए तो ए बंनेनो त्याग करी शुद्धोपयोगनी निरंतर भावना भावी आत्मस्वरूपमां स्थिर थवानो प्रयत्न करवो योग्य छे. ८३.

ते केवी रीते तजवां तेनो त्यागक्रम दर्शावी कहे छेः

श्लोक ८४

अन्वयार्थ :(अव्रतानि) हिंसादिक पांच अव्रतोने (परित्यज्य) छोडीने (व्रतेषु) अहिंसादिक व्रतोमां (परिनिष्ठितः) निष्ठावान रहेवुंअर्थात् तेनुं द्रढताथी पालन करवुं; पछी (आत्मनः) आत्माना (परमं पदं) परम वीतराग पदने (प्राप्य) प्राप्त करने (तानि अपि) १. जुओश्री समयसारगाथा १४५ थी १५०.

अव्रतने परित्यागीने व्रतमां रहे सुनिष्ठ,
व्रतने पण पछी परिहरे लही परम पद निज. ८४.