Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 98.

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समाधितंत्र१६५
उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमोऽथवा
मथित्वाऽऽत्मानमात्मैव जायतेऽग्निर्यथा तरुः ।।९८।।

टीकाअथवा आत्मानमेव चित्स्वरूपमेव चिदानन्दमयमुपास्य आत्मा परमः परमात्मा जायते अमुमेवार्थं दृष्टान्तद्वारेण समर्थयमानः प्राहमथित्वेत्यादि यथाऽऽत्मानमेव मथित्वा घर्षयित्वा तरुरात्मां (?) तरुरूषः स्वभावः स्वत एवाग्निर्जायते ।।९८।।

श्लोक ९८

अन्वयार्थ :(अथवा) अथवा (आत्मा) आत्मा (आत्मानं एव) पोताना आत्मानी ज (उपास्य) उपासना करी (परमः) परमात्मा (जायते) थई जाय छे; (यथा) जेम (तरुः) वांसनुं झाड (आत्मानं) पोताने (आत्मा एव) पोते ज (मथित्वा) मथीनेरगडीने (अग्निः) अग्निरूप (जायते) थई जाय छे तेम.

टीका :अथवा आत्मानी ज एटले चिदानन्दमय चित्स्वरूपनी ज उपासना करीने आत्मा परम एटले परमात्मा थाय छे. आ ज अर्थनुं द्रष्टान्त द्वारा समर्थन करी कहे छेमथीने इत्यादिजेम पोते पोताने ज मथीने (रगडीने)घसीने, वृक्ष अर्थात् वृक्षरूप स्वभाव स्वतः ज अग्निरूप थाय छे, तेम (आत्मा आत्माने ज मथीनेउपासीनेपरमात्मारूप थाय छे).

भावार्थ :जेम वांसनुं वृक्ष वांस साथे रगडी (मथी) स्वयं अग्निरूप थई जाय छे, तेम आत्मा पण पोताना चिदानन्दमय चित्स्वरूपनी उपासना करीने स्वयं परमात्मारूप थई जाय छे.

जेम वांसना वृक्षमां अग्नि शक्तिरूपे विद्यमान छे अने ते घर्षणथी प्रगट थाय छे, तेम आत्मामां पण पूर्ण ज्ञानादि गुणो शक्तिरूपे विद्यमान छे अने ते आत्मानी आत्मा साथे एकरूपता थतां प्रगट थाय छेअर्थात् आत्मा अन्य बाह्याभ्यंतर संकल्पविकल्परूप व्यापारोथी पोताना उपयोगने हठावी स्वरूपमां एकाग्र करी दे छे त्यारे तेना ते गुण (शुद्ध पर्यायो) प्रगट थाय छे. आत्माना आत्मा साथेना संघर्षथी ध्यानरूपी अग्नि प्रगट थाय छे. तेना निमित्ते ज्यारे कर्मरूपी इन्धन सर्वथा बळी जाय छे. त्यारे ते आत्मा परमात्मा थई जाय छे.

अथवा निजने सेवीने जीव परम थई जाय;
जेम वृक्ष निजने मथी पोते पावक थाय. ९८.