टीका — अथवा आत्मानमेव चित्स्वरूपमेव चिदानन्दमयमुपास्य आत्मा परमः परमात्मा जायते । अमुमेवार्थं दृष्टान्तद्वारेण समर्थयमानः प्राह – मथित्वेत्यादि । यथाऽऽत्मानमेव मथित्वा घर्षयित्वा तरुरात्मां (?) तरुरूषः स्वभावः स्वत एवाग्निर्जायते ।।९८।।
अन्वयार्थ : — (अथवा) अथवा (आत्मा) आत्मा (आत्मानं एव) पोताना आत्मानी ज (उपास्य) उपासना करी (परमः) परमात्मा (जायते) थई जाय छे; (यथा) जेम (तरुः) वांसनुं झाड (आत्मानं) पोताने (आत्मा एव) पोते ज (मथित्वा) मथीने – रगडीने (अग्निः) अग्निरूप (जायते) थई जाय छे तेम.
टीका : — अथवा आत्मानी ज एटले चिदानन्दमय चित्स्वरूपनी ज उपासना करीने आत्मा परम एटले परमात्मा थाय छे. आ ज अर्थनुं द्रष्टान्त द्वारा समर्थन करी कहे छे — मथीने इत्यादि – जेम पोते पोताने ज मथीने (रगडीने) – घसीने, वृक्ष अर्थात् वृक्षरूप स्वभाव स्वतः ज अग्निरूप थाय छे, तेम (आत्मा आत्माने ज मथीने – उपासीने – परमात्मारूप थाय छे).
भावार्थ : — जेम वांसनुं वृक्ष वांस साथे रगडी (मथी) स्वयं अग्निरूप थई जाय छे, तेम आत्मा पण पोताना चिदानन्दमय चित्स्वरूपनी उपासना करीने स्वयं परमात्मारूप थई जाय छे.
जेम वांसना वृक्षमां अग्नि शक्तिरूपे विद्यमान छे अने ते घर्षणथी प्रगट थाय छे, तेम आत्मामां पण पूर्ण ज्ञानादि गुणो शक्तिरूपे विद्यमान छे अने ते आत्मानी आत्मा साथे एकरूपता थतां प्रगट थाय छे – अर्थात् आत्मा अन्य बाह्याभ्यंतर संकल्प – विकल्परूप व्यापारोथी पोताना उपयोगने हठावी स्वरूपमां एकाग्र करी दे छे त्यारे तेना ते गुण (शुद्ध पर्यायो) प्रगट थाय छे. आत्माना आत्मा साथेना संघर्षथी ध्यानरूपी अग्नि प्रगट थाय छे. तेना निमित्ते ज्यारे कर्मरूपी इन्धन सर्वथा बळी जाय छे. त्यारे ते आत्मा परमात्मा थई जाय छे.