१६४समाधितंत्र
इदानीमभिन्नात्मनोपासने फलमाह — जेम दीपथी भिन्न वाट (दीवेट) दीपने उपासी एटले पामी ताद्रश (तेना जेवी) थाय छे – अर्थात् दीपरूप थाय छे तेम.
भावार्थ : — जेम वाट दीपकनी उपासना करी (दीपकनो गाढ नजीक संबंध साधी) तद्रूप (दीपकरूप) थई जाय छे, तेम आ आत्मा पोतानाथी भिन्न आत्मानी (अर्हन्त – सिद्धरूप परमात्मानी) उपासना करीने स्वयं तेमना समान परमात्मा थई जाय छे.
अर्हंतादि भिन्न साध्यनी उपासना द्वारा अर्थात् तेमना द्रव्य – गुण – पर्यायना सत्य ज्ञान द्वारा जो जीव पोताना द्रव्य – गुण – पर्यायने सम्यक्पणे जाणे अने तेनी प्रतीति करे तथा त्यारबाद अर्हंतादि पर तरफनुं पण वलण हठावी स्वसन्मुख थई सम्यक् श्रद्धा – ज्ञानपूर्वक पोताना चैतन्यस्वरूपमां स्थिरता करे तो तेनो मोह नाश पामे छे अने ते परमात्मा थाय छे.१
आत्मस्वरूपमां स्थिरता ते निश्चय उपासना अर्थात् अभिन्न साध्यनी उपासना छे अने अर्हंतादि भिन्न साध्यनी उपासना ते व्यवहार उपासना छे.
साधक दशामां सम्यग्द्रष्टि जीवने अस्थिरताना कारणे भगवाननी पूजा – भक्ति आदिरूप पुण्यबंधनी संप्राप्तिना हेतुभूत शुभ राग भूमिकानुसार आवे छे, पण ते तेने आत्महित माटे भलो मानतो नथी. ते रागने रोग समान गणे छे, तेथी तेने ते हेयबुद्धिए वर्ते छे – अर्थात् तेने रागनो राग नथी – तेनुं तेने स्वामीत्व नथी. तेनो आ शुभ राग सवारनी लाल संध्या जेवो छे. जेम सवारनी लाल संध्यानो अभाव थतां तुरत ज सूर्यना तेजस्वी प्रकाशनो आविर्भाव थाय छे, तेम सम्यग्द्रष्टिना हेयबुद्धिए वर्तता शुभ रागनो अभाव थतां – तेनो अतिक्रम थतां आत्माना निर्मळ प्रचंड प्रकाशनो आविर्भाव थाय छे. रागरूप सविकल्प दशानो (व्यवहारनो) अभाव थतां वीतरागरूप निर्विकल्प दशा प्रगट थाय छे. आ दशामां जीवने वचनातीत अपूर्व आनंदनो अनुभव थाय छे. ए रीते सम्यग्द्रष्टिना भिन्नात्मानी उपासनारूप शुभ रागनो अभाव ते मोक्षनुं – परमात्मपदनुं साक्षात् कारण छे. ९७.
हवे अभिन्न आत्मानी उपासनानुं फल कहे छेः — १. जुओ – श्री प्रवचनसार गाथा – ८०.