इति एवमुक्तप्रकारेण इदं भिन्नमभिन्नं चात्मस्वरूपं भावयेत् नित्यं सर्वदा । ततः किं भवति ? आप्नोति । किं ? तत्पदं मोक्षस्थानं । कथम्भूतं ? अवाचां गोचरं वचनैरनिर्देश्यं । कथं तत्प्राप्नोति ? स्वतः एव आत्मनैव परमार्थतो न पुनर्गुर्वादिबाह्यनिमित्तात् । यतः प्राप्तात् तत्पदान्नावर्तते संसारे पुनर्न भ्रमति ।।९९।।
टीका : — आ प्रमाणे एटले उक्त प्रकारे आ भिन्न ने अभिन्न आत्मस्वरूपनी, नित्य एटले सर्वदा, भावना करवी. तेथी शुं थाय छे? ते पद – मोक्षस्थान (प्राप्त थाय छे). ते (पद) केवुं छे? वाणीने अगोचर एटले वचनो द्वारा कही शकाय नहि तेवुं (अनिर्वचनीय) छे. ते केवी रीते प्राप्त करे छे? परमार्थे स्वतः ज (पोतानी मेळे ज) – आत्माथी ज (प्राप्त करे छे) पण गुरु आदि बाह्य निमित्त वडे नहि; ज्यांथी एटले प्राप्त थयेला ते पदथी (मोक्षस्थानेथी) ते पाछो आवतो नथी – अर्थात् फरीथी संसारमां भमतो नथी.
भावार्थ : — साधकने निर्विकल्प दशामां पोताना आत्मानो आश्रय अने सविकल्प दशामां अर्हंतादिनी उपासनादि होय छे. क्रमे क्रमे आत्मानो आश्रय वधतो जाय छे अने भगवाननी उपासनादिरूप व्यवहार घटतो जाय छे. पोताना आत्मानी उपासना पूर्ण थतां भगवाननी उपासनारूप विकल्पनो पण अभाव थाय छे. तेनुं नाम भिन्न ने अभिन्न आत्मस्वरूपनी नित्य भावना करवी एम कहेवामां आवे छे. ते प्रमाणे वीतरागता पूर्ण थतां केवळज्ञान पामी जीव मोक्ष प्राप्त करे छे अने मोक्षस्थान पाम्या पछी जीव कदी संसारमां पाछो आवतो नथी; केम के तेने रागनो सर्वथा अभाव वर्ते छे. राग विना संसार अर्थात् भवभ्रमण – जन्म
आत्मस्वरूपनी प्राप्ति माटे जेमणे आत्मानो पूर्ण विकास साध्यो छे तेवा अर्हन्त अने सिद्ध परमात्माना स्वरूपने यथार्थपणे जाणी तद्रूप थवानी भावनामां मग्न रहेवुं, अने पछी पोताना आत्मस्वरूपमां स्थिर थवानो सदा द्रढ अभ्यास करवो. एम करवाथी वचनातीत अतीन्द्रिय परमात्मपदनी प्राप्ति थाय छे. ते पद प्राप्त कर्या पछी संसारमां फरीथी जन्म लेवो पडतो नथी. सदाने माटे संसारना सर्व प्रकारनां दुःखोथी छूटकारो थाय छे अने ते सदा ज्ञानानन्दमां मग्न रहे छे.
प्रस्तुत श्लोकमां ‘स्वतः एव’ शब्दो घणा अर्थसूचक छे. ते बतावे छे के परमात्मपदनी प्राप्ति पोतनामांथी ज पोताना पुरुषार्थथी ज थाय छे. तेमां तीर्थंकर भगवान आदिनी उपासना, दिव्य – ध्वनि, गुरुना उपदेशादि बाह्य निमित्तो होवा छतां निमित्तोथी निरपेक्षपणे