१६८समाधितंत्र
ननु आत्मनि सिद्धे तस्य तत्पदप्राप्तिः स्यात् न चासौ तत्त्वचतुष्टयात्मकाच्छरीरात्तत्त्वान्तरभूतः सिद्ध इति चार्वाकाः । सदैवात्मा मुक्तः सर्वदा स्वरूपोपलम्भसम्भवादिति सांख्यास्तान् प्रत्याह —
टीका — चित्तत्त्वं चेतनालक्षणं तत्त्वं यदि भूतजं पृथिव्यप्तेजोवायुलक्षणभूतेभ्यो जातं यद्यभ्युपगम्यते तदाऽयत्नसाध्यं निर्वाणं यत्नेन तात्पर्येण साध्यं निर्वाणं न भवति । परमपदनी प्राप्ति थाय छे. निमित्तथी कदी थती नथी, केम के ज्यां सुधी निमित्त तरफ लक्ष होय त्यां सुधी आत्मा तरफ लक्ष वळतुं नथी.
परमात्मा थवानी शक्ति पोतानामां मोजूद छे. ते शक्तिनुं सम्यक् प्रकारे श्रद्धान – ज्ञान करी, आत्मसन्मुख थई तेने प्रगट करवानो अविरत प्रयत्न करवामां आवे तो परमपदनी प्राप्ति अवश्य थाय. ९९.
आत्मा छे एवुं सिद्ध होय, तो तेने ते पदनी प्राप्ति संभवे, पण ते (आत्मा) चार तत्त्वोना समूहरूप शरीरथी भिन्न अन्य तत्त्वरूप सिद्ध थतो नथी एवुं चार्वाको माने छे; अने सर्वदा स्वरूपनी उपलब्धिनो संभव होवाथी सदाय मुक्त छे – एवो सांख्यमत छे. तेमना प्रति कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (चित्तत्वं) चेतना लक्षणवाळो आ जीव (यजि भूतजम्) जो भूत – चतुष्टयथी उत्पन्न थयेला होय, तो (निर्वाणं) मोक्ष (अयत्नसाध्यं) यत्न साधवा योग्य रहे नहि, (अन्यथा) अथवा (योगतः) योगथी एटले शारीरिक योगक्रियाथी (निर्वाणं) निर्वाणनी प्राप्ति थाय, तो (तस्मात्) तेनाथी (योगिनां) योगीओने (क्वचित्) कोई पण अवस्थामां (दुःखं न) दुःख होय नहि.
टीका : — चित्तत्व एटले चेतनास्वरूप तत्त्व जो भूत ज होय अर्थात् पृथ्वी, पाणी, तेज अने वायुरूप भूतोमांथी उत्पन्न थयेलुं मानवामां आवे, तो निर्वाण अयत्नसाध्य रहे