Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र१७५

आम जीवनी इच्छा अने शरीरनी क्रियाने सीधो निमित्तनैमित्तिक संबंध नथी, परंतु जीवनी इच्छा अने वायुने निमित्तनैमित्तिक संबंध छे अने वायु तथा शरीरनी क्रियाने निमित्तनैमित्तिक संबंध छे.

विशेष

स्थूलद्रष्टिए (व्यवहार नये) जीवनी इच्छाथी शरीर चाले छे एम कहेवामां आवे छे तेनो अर्थ ए छे के जीवनी इच्छाथी के वायुथी शरीरनी क्रियाओ खरेखर थती नथी, पण निमित्तनुं ज्ञान कराववा माटे उपचारथी तेम कहेवामां आवे छे.

योग (अर्थात् मनवचनकायना निमित्ते आत्मप्रदेशोनुं चलन) अने उपयोग (अशुद्ध उपयोगज्ञाननुं कषायो साथे जोडावुं)ए बंनेनो कर्ता, आत्मा कदाचित भले हो, तथापि पर द्रव्यस्वरूप कर्मनो कर्ता तो ते निमित्तपणे पण कदी नथी. अज्ञान अवस्थामां ज आत्माने योगउपयोगनो कर्ता कही शकाय, पण शरीरादि पर द्रव्योनो कर्ता तो ते निमित्तपणे पण कदी नथी.

आ उपरथी एम समजवुं के जो जीव, पुद्गलकर्मनो खरेखर कर्ता नथी, तो शरीरनी कोई क्रियानो कर्ता ते केम होई शके? जरा पण नहि; परंतु अज्ञान दशामां जीवनो योग अने उपयोग, शरीरनी क्रियामां निमित्त थाय छे.

द्रव्यद्रष्टिथी तो ‘कोई द्रव्य कोई द्रव्यनो कर्ता नथी,’ परंतु पर्यायद्रष्टिथी कोई द्रव्यनो पर्याय कोई वखते कोई अन्य द्रव्यना पर्यायने निमित्त थाय छे, तेथी आ अपेक्षाए एक द्रव्यना परिणाम अन्य द्रव्यना परिणामना निमित्तकर्ता कहेवाय छे. परमार्थे द्रव्य पोताना ज परिणामनो (शुद्धअशुद्ध परिणामनो) कर्ता छे, ते अन्य द्रव्यना परिणामनो कर्ता नथी.

‘‘अन्य द्रव्यथी अन्य द्रव्यने गुणनी (पर्यायनी) उत्पत्ति करी शकाती नथी; तेथी (ए सिद्धांत छे के) ‘सर्व द्रव्यो पोतपोताना स्वभावथी ज ऊपजे छे.’’

‘‘.....सर्व द्रव्यो, निमित्तभूत अन्य द्रव्योना स्वभावथी ऊपजतां नथी, परंतु पोताना १. जुओमोक्षमार्ग प्रकाशकगु. आवृत्ति पृ. २५६. २. जुओश्री समयसार गु. आवृत्तिगा. १०० अने तेनो भावार्थ. ३. को द्रव्य बीजा द्रव्यने उत्पाद नहि गुणनो करे,

तेथी बधांये द्रव्य निज स्वभावथी ऊपजे खरे. (श्री समयसार गु. आवृत्ति गा. ३७२)