आम जीवनी इच्छा अने शरीरनी क्रियाने सीधो निमित्त – नैमित्तिक संबंध नथी, परंतु जीवनी इच्छा अने वायुने निमित्त – नैमित्तिक संबंध छे अने वायु तथा शरीरनी क्रियाने निमित्त – नैमित्तिक संबंध छे.
स्थूलद्रष्टिए (व्यवहार नये) जीवनी इच्छाथी शरीर चाले छे एम कहेवामां आवे छे तेनो अर्थ ए छे के जीवनी इच्छाथी के वायुथी शरीरनी क्रियाओ खरेखर थती नथी, पण निमित्तनुं ज्ञान कराववा माटे उपचारथी तेम कहेवामां आवे छे.१
योग (अर्थात् मन – वचन – कायना निमित्ते आत्म – प्रदेशोनुं चलन) अने उपयोग (अशुद्ध उपयोग – ज्ञाननुं कषायो साथे जोडावुं) – ए बंनेनो कर्ता, आत्मा कदाचित भले हो, तथापि पर द्रव्य – स्वरूप कर्मनो कर्ता तो ते निमित्तपणे पण कदी नथी. अज्ञान अवस्थामां ज आत्माने योग – उपयोगनो कर्ता कही शकाय, पण शरीरादि पर द्रव्योनो कर्ता तो ते निमित्तपणे पण कदी नथी.
आ उपरथी एम समजवुं के जो जीव, पुद्गल – कर्मनो खरेखर कर्ता नथी, तो शरीरनी कोई क्रियानो कर्ता ते केम होई शके? जरा पण नहि; परंतु अज्ञान दशामां जीवनो योग अने उपयोग, शरीरनी क्रियामां निमित्त थाय छे.
द्रव्यद्रष्टिथी तो ‘कोई द्रव्य कोई द्रव्यनो कर्ता नथी,’ परंतु पर्यायद्रष्टिथी कोई द्रव्यनो पर्याय कोई वखते कोई अन्य द्रव्यना पर्यायने निमित्त थाय छे, तेथी आ अपेक्षाए एक द्रव्यना परिणाम अन्य द्रव्यना परिणामना निमित्त – कर्ता कहेवाय छे. परमार्थे द्रव्य पोताना ज परिणामनो (शुद्ध – अशुद्ध परिणामनो) कर्ता छे, ते अन्य द्रव्यना परिणामनो कर्ता नथी.२
‘‘अन्य द्रव्यथी अन्य द्रव्यने गुणनी (पर्यायनी) उत्पत्ति करी शकाती नथी; तेथी (ए सिद्धांत छे के) ‘सर्व द्रव्यो पोतपोताना स्वभावथी ज ऊपजे छे.’’३
‘‘.....सर्व द्रव्यो, निमित्तभूत अन्य द्रव्योना स्वभावथी ऊपजतां नथी, परंतु पोताना १. जुओ – मोक्षमार्ग प्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. २५६. २. जुओ – श्री समयसार गु. आवृत्ति – गा. १०० अने तेनो भावार्थ. ३. को द्रव्य बीजा द्रव्यने उत्पाद नहि गुणनो करे,