सुलोचनोऽहं स्थूलोऽहंमित्याद्यभेदरूपतया आत्मन्यध्यारोप्य जडो बहिरात्मा असुखं सुखं वा यथा भवत्येवमास्ते । विद्वानन्तरात्मा पुनः प्राप्नोति किं ? तत्परमं पदं मोक्ष । किं कृत्वा ? त्यक्त्वा । कं ? आरोपं शरीरादिनामात्मन्यध्यवसायम् ।।१०४।।
कथमसौ तं त्यजतीत्याह – अथवा स्वकृतग्रन्थार्थमुपसंहृत्य फलमुपदर्शयन्मुक्त्वेत्याह — (शरीरादिने आत्मा कल्पी) – अर्थात् हुं गोरो, हुं सुंदर आंखवाळो, हुं जाडो इत्यादि अभेदरूपपणे (एकताबुद्धिए) आत्मामां आरोपीने, जड – बहिरात्मा जेम असुख – सुख थाय तेम वर्ते छे, परंतु विद्वान – अन्तरात्मा प्राप्त करे छे. शुं? ते परमपदने – मोक्षने. शुं करीने? त्यजीने, शुं (त्यजीने)? शरीरादिनो आत्मा विषे जे आरोप छे – अध्यवसाय छे तेने (त्यजीने).
भावार्थ : — हुं गोरो, हुं सुंदर, हुं जाडो इत्यादिरूप, शरीरादिमां आत्मानी अभेद कल्पना करी (आत्मबुद्धि करी) अज्ञानी बहिरात्मा सुख – दुःख माने छे, परंतु ज्ञानी अंतरात्मा आत्मामां शरीरादिनो मिथ्या अभेद – अध्यवसायनो त्याग करी परमपदने – मोक्षने प्राप्त करे छे.
अनादिथी शरीर अने आत्माने संयोगसंबंध छे. आ संबंधने लीधे शरीरना अंगोपांगनी क्रिया जोई अज्ञानीने भ्रम थाय छे के ए बधी क्रियाओ आत्मानी छे, पण वास्तवमां आत्मा अने शरीर लक्षणे एकबीजाथी तद्दन भिन्न छे. एक चेतन अने अरूपी छे अने बीजुं अचेतन – जड अने रूपी छे. बंने वच्चे मात्र निमित्त – नैमित्तिक संबंध छे, पण अज्ञानी भ्रमथी निमित्त – नैमित्तिक संबंधने बदले कर्ता – कर्म संबंध समजी पोताने सुखी – दुःखी कल्पे छे.
ज्ञानीने शरीर अने आत्मानुं भेदज्ञान छे. ते शरीरनी क्रियाओने आत्मानी क्रिया मानतो नथी. तेने शरीरमां आत्मबुद्धि – एकताबुद्धि नथी, तेथी शरीरनी क्रियामां तेने कर्ता – बुद्धि नथी. शरीरादिमां कर्ता – बुद्धि नहि होवाथी तेने हर्ष – शोक के राग – द्वेष पण नथी. तेना अभावमां ज्ञानीने कर्मनो नवो बंध थतो नथी. भेदविज्ञानना बळे जेम जेम वीतरागता वधती जाय छे, तेम तेम जूनां कर्म पण उदयमां आवी निर्जरी जाय छे. अंते कर्मोनो संपूर्णपणे अभाव थतां परम वीतरागपदनी प्राप्ति थाय छे. १०४.
ते तेने केवी रीते त्यजे छे ते कहे छे – अथवा पोताना रचेला ग्रन्थना अर्थनो उपसंहार करीने फल दर्शावतां. ‘मुक्त्वा’ एम कहीने, कहे छेः —