Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८०समाधितंत्र

जीयात्सोऽत्रजिनः समस्तविषयः श्रीपूज्यपादोऽमलो,
भव्यानन्दकरः समाधिशतकश्रीमत्प्रभेन्दुः प्रभुः
।।।।
इति श्रीपण्डितप्रभाचन्द्रविरचिता समाधिशतकटीका समाप्ता ।।

सद्ध्यानथी अनन्तचतुष्टमय अमल शरीररूप मोक्ष छे एम प्रसिद्ध कर्युं छे, ते पूज्यपाद प्रभु अहीं जय पामो! ते केवा छे? ते जिन छे, तेमना (इन्द्रिय) विषयो बधा अस्त थई गया छे, ते अमल छे, भव्य जीवोने आनंदकर छे, समाधिशतकरूप श्रीथी युक्त छे अने प्रभामां चंद्र समान छे.

आ श्लोकमां समाधितंत्रना (अपर नाम समाधिशतकना) रचयिता श्री पूज्यपादाचार्य प्रति प्रशस्ति द्वारा पूज्यभाव प्रगट करी तेना टीकाकार श्री प्रभाचन्द्रे गर्भितपणे ‘श्रीमत् प्रभेन्दु’ शब्दो द्वारा समाधिशतकना टीकाकार तरीके पोताना नामनो पण उल्लेख कर्यो छे.

इति श्री पंडित प्रभाचंद्रविरचित समाधिशतकनी टीका
समाप्त
समाप्तोऽयं ग्रन्थः