Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र१७९

संसारदुःखजननीं चतुर्गतिक दुःखोत्पत्तिहेतुभूतां यतस्तथाभूतां तां त्यजेत् किं कृत्वा ? अधिगम्य किं तत् ? समाधितंत्रं समाधेः परमात्मस्वरूपसंवेदनैकाग्रतायाः परमोदासीनताया वा तन्त्रं प्रतिपादकं शास्त्रं कथम्भूतं तत् ? तन्मार्ग तस्य ज्योतिर्मयसुखस्य मार्गमुपायमिति ।।१०५।।

टीकाप्रशस्तिः

येनात्मा बहिरन्तरुत्तमभिदा त्रेधा विवृत्योदितो,
मोक्षोऽनन्तचतुष्टयाऽमलवपुः सद्ध्यानतः कीर्तितः

प्रकारनी ते (बुद्धि)नो त्याग करवो. शुं करीने? जाणीने. शुं (जाणीने)? समाधितंत्रने समाधिना एटले परमात्मस्वरूपना संवेदनमां एकाग्रताना अथवा परम उदासीनताना तंत्रने एटले प्रतिपादक शास्त्रने. ते केवुं छे? तेना मार्गरूप छे, तेना एटले ज्योतिर्मय सुखना मार्गरूप एटले उपायरूप (शास्त्र) छे.

भावार्थ :श्री पूज्यपादाचार्यविरचित आ ‘समाधितंत्र’ शास्त्र, परमात्मस्वरूपना संवेदनमां एकाग्रता ज समाधि छेअर्थात् परमपदनी प्राप्तिनो उपाय छेतेनुं प्रतिपादन करे छे. आ ‘समाधितंत्र’नो सारी रीते अभ्यास करीने, शरीरादि पर पदार्थोमां जे अंतरात्मा अहंबुद्धि अने परबुद्धिनो त्याग करे छे अने परमात्मानी भावनामां चित्त स्थिर करे छे ते संसारना दुःखोथी मुक्त थई केवळज्ञानमय परम सुखने प्राप्त करे छे.

ए रीते आचार्यदेवे प्रस्तुत ‘समाधितंत्र’नी अगत्यता दर्शावी परम पदनी प्राप्तिनो उपाय बताव्यो छे.

ज्यां सुधी स्वपरनुं भेदज्ञान थाय नहि, त्यां सुधी जीव अज्ञानी रहे छे अने अज्ञानजनित भ्रमने लीधे ते शरीरादि परपदार्थोमां अहंबुद्धिआत्मबुद्धि करे छे, अर्थात् तेमां पोताना आत्मानी कल्पना करी कर्ताबुद्धि सेवे छे. ते शरीरनी क्रिया अथवा परनां कार्यो हुं करुं छुंएम माने छे. वळी तेने शरीर अने परपदार्थो प्रत्ये ममकारबुद्धि होय छे, अर्थात् शरीर मारुं, स्त्रीपुत्रमकानादि मारांएवी भ्रमजनित मान्यता ते करे छे. आ अज्ञानमूलक मान्यताना कारणे जीवने रागद्वेषादि कषायभाव थाय छे जे चतुर्गतिरूप संसारभ्रमणनुं मूल कारण छे. स्वसन्मुख थई आत्मस्वरूपमां स्थिर थवानी भावना करवी ते ज संसारनां दुःखोथी मुक्तिनो अने परम पदनी प्राप्तिनो उपाय छे. १०५.

टीकाप्रशस्ति

जेमणे आत्माने बर्हि, अंतर ने उत्तमएम त्रण प्रकारे वर्णवी बताव्यो छे, जेमणे