Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

मोक्ष अधिकार
४३१

बन्धस्य तु आत्मद्रव्यासाधारणा रागादयः स्वलक्षणम् न च रागादय आत्मद्रव्यसाधारणतां बिभ्राणाः प्रतिभासन्ते, नित्यमेव चैतन्यचमत्कारादतिरिक्तत्वेन प्रतिभासमानत्वात् न च यावदेव समस्तस्वपर्यायव्यापि चैतन्यं प्रतिभाति तावन्त एव रागादयः प्रतिभान्ति, रागादीनन्तरेणापि चैतन्यस्यात्मलाभसम्भावनात् यत्तु रागादीनां चैतन्येन सहैवोत्प्लवनं तच्चेत्यचेतकभावप्रत्यासत्तेरेव, नैकद्रव्यत्वात्; चेत्यमानस्तु रागादिरात्मनः, प्रदीप्यमानो घटादिः प्रदीपस्य प्रदीपकतामिव, चेतकतामेव प्रथयेत्, न पुना रागादिताम् एवमपि तयोरत्यन्तप्रत्यासत्त्या भेदसम्भावना- भावादनादिरस्त्येकत्वव्यामोहः, स तु प्रज्ञयैव छिद्यत एव

(हवे बंधना स्वलक्षण विषे कहेवामां आवे छेः) बंधनुं स्वलक्षण तो आत्मद्रव्यथी असाधारण एवा रागादिक छे. ए रागादिक आत्मद्रव्य साथे साधारणपणुं धरता (धारण करता) प्रतिभासता नथी, कारण के तेओ सदाय चैतन्यचमत्कारथी भिन्नपणे प्रतिभासे छे. वळी जेटलुं, चैतन्य आत्माना समस्त पर्यायोमां व्यापतुं प्रतिभासे छे, तेटला ज, रागादिक प्रतिभासता नथी, कारण के रागादिक विना पण चैतन्यनो आत्मलाभ संभवे छे (अर्थात् रागादिक न होय त्यां पण चैतन्य होय छे). वळी जे, रागादिकनुं चैतन्य साथे ज ऊपजवुं थाय छे ते चेत्यचेतकभावनी (ज्ञेयज्ञायकभावनी) अति निकटताने लीधे ज छे, एकद्रव्यपणाने लीधे नहि; जेम (दीपक वडे) प्रकाशवामां आवता घटादिक (पदार्थो) दीपकना प्रकाशकपणाने ज जाहेर करे छेघटादिपणाने नहि, तेम (आत्मा वडे) चेतवामां आवता रागादिक (अर्थात् ज्ञानमां ज्ञेयरूपे जणाता रागादिक भावो) आत्माना चेतकपणाने ज जाहेर करे छे रागादिपणाने नहि.

आम होवा छतां ते बन्नेनी (आत्मानी अने बंधनी) अत्यंत निकटताने लीधे भेदसंभावनानो अभाव होवाथी अर्थात् भेद नहि देखातो होवाथी (अज्ञानीने) अनादि काळथी एकपणानो व्यामोह (भ्रम) छे; ते व्यामोह प्रज्ञा वडे ज अवश्य छेदाय छे.

भावार्थःआत्मा अने बंध बन्नेने लक्षणभेदथी ओळखी बुद्धिरूपी छीणीथी छेदी जुदा जुदा करवा.

आत्मा तो अमूर्तिक छे अने बंध सूक्ष्म पुद्गलपरमाणुओनो स्कंध छे तेथी बन्ने जुदा छद्मस्थना ज्ञानमां आवता नथी, मात्र एक स्कंध देखाय छे (अर्थात् बन्ने एकपिंडरूप देखाय छे); तेथी अनादि अज्ञान छे. श्री गुरुओनो उपदेश पामी तेमनां लक्षण जुदां जुदां अनुभवीने जाणवुं के चैतन्यमात्र तो आत्मानुं लक्षण छे अने रागादिक बंधनुं लक्षण छे तोपण मात्र ज्ञेयज्ञायकभावनी अति निकटताथी तेओ एक जेवा थई रह्या देखाय छे. तेथी तीक्ष्ण बुद्धिरूपी