भिन्नकरणासम्भवात्, भगवती प्रज्ञैव छेदनात्मकं करणम् । तया हि तौ छिन्नौ नानात्वम-
वश्यमेवापद्येते; ततः प्रज्ञयैवात्मबन्धयोर्द्विधाकरणम् । ननु कथमात्मबन्धौ चेत्यचेतकभावेनात्यन्त-
प्रत्यासत्तेरेकीभूतौ भेदविज्ञानाभावादेकचेतकवद्वयवह्रियमाणौ प्रज्ञया छेत्तुं शक्येते ? नियतस्व- लक्षणसूक्ष्मान्तःसन्धिसावधाननिपातनादिति बुध्येमहि । आत्मनो हि समस्तशेषद्रव्यासाधारणत्वा- च्चैतन्यं स्वलक्षणम् । तत्तु प्रवर्तमानं यद्यदभिव्याप्य प्रवर्तते निवर्तमानं च यद्यदुपादाय निवर्तते
तत्तत्समस्तमपि सहप्रवृत्तं क्रमप्रवृत्तं वा पर्यायजातमात्मेति लक्षणीयः, तदेकलक्षणलक्ष्यत्वात्; समस्तसहक्रमप्रवृत्तानन्तपर्यायाविनाभावित्वाच्चैतन्यस्य चिन्मात्र एवात्मा निश्चेतव्यः, इति यावत् ।
होवाथी भगवती प्रज्ञा ज ( – ज्ञानस्वरूप बुद्धि ज) छेदनात्मक ( – छेदनना स्वभाववाळुं) करण छे. ते प्रज्ञा वडे तेमने छेदवामां आवतां तेओ नानापणाने अवश्य पामे छे; माटे प्रज्ञा वडे ज आत्मा अने बंधनुं द्विधा करवुं छे (अर्थात् प्रज्ञारूपी करण वडे ज आत्मा ने बंध जुदा कराय छे).
(अहीं प्रश्न थाय छे के – ) आत्मा अने बंध के जेओ *चेत्यचेतकभाव वडे अत्यंत निकटताने लीधे एक ( – एक जेवा – ) थई रह्या छे, अने भेदविज्ञानना अभावने लीधे, जाणे तेओ एक चेतक ज होय एम जेमनो व्यवहार करवामां आवे छे (अर्थात् जेमने एक आत्मा तरीके ज व्यवहारमां गणवामां आवे छे) तेओ प्रज्ञा वडे खरेखर कई रीते छेदी शकाय?
(तेनुं समाधान आचार्यदेव करे छेः — ) आत्मा अने बंधनां नियत स्वलक्षणोनी सूक्ष्म अंतःसंधिमां (अंतरंगनी संधिमां) प्रज्ञाछीणीने सावधान थईने पटकवाथी ( – नाखवाथी, मारवाथी) तेमने छेदी शकाय छे अर्थात् जुदा करी शकाय छे एम अमे जाणीए छीए.
आत्मानुं स्वलक्षण चैतन्य छे, कारण के ते समस्त शेष द्रव्योथी असाधारण छे (अर्थात् अन्य द्रव्योमां ते नथी). ते (चैतन्य) प्रवर्ततुं थकुं जे जे पर्यायने व्यापीने प्रवर्ते छे अने निवर्ततुं थकुं जे जे पर्यायने ग्रहण करीने निवर्ते छे ते ते समस्त सहवर्ती के क्रमवर्ती पर्यायो आत्मा छे एम लक्षित करवुं — लक्षणथी ओळखवुं (अर्थात् जे जे गुणपर्यायोमां चैतन्यलक्षण व्यापे छे ते ते समस्त गुणपर्यायो आत्मा छे एम जाणवुं) कारण के आत्मा ते ज एक लक्षणथी लक्ष्य छे (अर्थात् चैतन्यलक्षणथी ज ओळखाय छे). वळी समस्त सहवर्ती अने क्रमवर्ती अनंत पर्यायो साथे चैतन्यनुं अविनाभावीपणुं होवाथी चिन्मात्र ज आत्मा छे एम निश्चय करवो. आटलुं आत्माना स्वलक्षण विषे.
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* आत्मा चेतक छे अने बंध चेत्य छे; अज्ञानदशामां तेओ एकरूप अनुभवाय छे.