कहानजैनशास्त्रमाळा ]
आत्मबन्धौ हि तावन्नियतस्वलक्षणविज्ञानेन सर्वथैव छेत्तव्यौ; ततो रागादिलक्षणः समस्त एव बन्धो निर्मोक्तव्यः, उपयोगलक्षणः शुद्ध आत्मैव गृहीतव्यः । एतदेव किलात्म- बन्धयोर्द्विधाकरणस्य प्रयोजनं यद्बन्धत्यागेन शुद्धात्मोपादानम् ।
‘आत्मा अने बंधने द्विधा करीने शुं करवुं’ एम पूछवामां आवतां हवे तेनो उत्तर कहे छेः —
गाथार्थः — [तथा] ए रीते [जीवः बन्धः च] जीव अने बंध [नियताभ्याम् स्वलक्षणाभ्यां] तेमनां निश्चित स्वलक्षणोथी [छिद्येते] छेदाय छे. [बन्धः] त्यां, बंधने [छेत्तव्यः] छेदवो अर्थात् छोडवो [च] अने [शुद्धः आत्मा] शुद्ध आत्माने [गृहीतव्यः] ग्रहण करवो.
टीकाः — आत्मा अने बंधने प्रथम तो तेमनां नियत स्वलक्षणोना विज्ञानथी सर्वथा ज छेदवा अर्थात् भिन्न करवा; पछी, रागादिक जेनुं लक्षण छे एवा समस्त बंधने तो छोडवो अने उपयोग जेनुं लक्षण छे एवा शुद्ध आत्माने ज ग्रहण करवो. आ ज खरेखर आत्मा अने बंधने द्विधा करवानुं प्रयोजन छे के बंधना त्यागथी (अर्थात् बंधनो त्याग करी) शुद्ध आत्मानुं ग्रहण करवुं.
भावार्थः — शिष्ये पूछ्युं हतुं के आत्मा अने बंधने द्विधा करीने शुं करवुं? तेनो आ उत्तर आप्यो के बंधनो तो त्याग करवो अने शुद्ध आत्मानुं ग्रहण करवुं.
(‘आत्मा अने बंधने भिन्न तो प्रज्ञा वडे कर्या परंतु आत्माने ग्रहण शा वडे कराय?’ — एवा प्रश्ननी तथा तेना उत्तरनी गाथा कहे छेः —