ननु केन शुद्धोऽयमात्मा गृहीतव्यः ? प्रज्ञयैव शुद्धोऽयमात्मा गृहीतव्यः, शुद्धस्यात्मनः स्वय- मात्मानं गृह्णतो, विभजत इव, प्रज्ञैककरणत्वात् । अतो यथा प्रज्ञया विभक्तस्तथा प्रज्ञयैव गृहीतव्यः ।
कथमयमात्मा प्रज्ञया गृहीतव्य इति चेत् —
गाथार्थः — (शिष्य पूछे छे के – ) [सः आत्मा] ते (शुद्ध) आत्मा [कथं] कई रीते [गृह्यते] ग्रहण कराय? (आचार्यभगवान उत्तर आपे छे के – ) [प्रज्ञया तु] प्रज्ञा वडे [सः आत्मा] ते (शुद्ध) आत्मा [गृह्यते] ग्रहण कराय छे. [यथा] जेम [प्रज्ञया] प्रज्ञा वडे [विभक्तः] भिन्न कर्यो, [तथा] तेम [प्रज्ञया एव] प्रज्ञा वडे ज [गृहीतव्यः] ग्रहण करवो.
टीकाः — शुद्ध एवो आ आत्मा शा वडे ग्रहण करवो? प्रज्ञा वडे ज शुद्ध एवो आ आत्मा ग्रहण करवो; कारण के शुद्ध आत्माने, पोते पोताने ग्रहतां, प्रज्ञा ज एक करण छे — जेम भिन्न करतां प्रज्ञा ज एक करण हतुं तेम. माटे जेम प्रज्ञा वडे भिन्न कर्यो तेम प्रज्ञा वडे ज ग्रहण करवो.
भावार्थः — भिन्न करवामां अने ग्रहण करवामां करणो जुदां नथी; माटे प्रज्ञा वडे ज आत्माने भिन्न कर्यो अने प्रज्ञा वडे ज ग्रहण करवो.
हवे पूछे छे के — आ आत्माने प्रज्ञा वडे कई रीते ग्रहण करवो? तेनो उत्तर कहे छेः —
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