भावार्थः — शुद्धनयनो विषय जे ज्ञानस्वरूप आत्मा छे ते कर्ताभोक्तापणाना भावोथी रहित छे, बंधमोक्षनी रचनाथी रहित छे, परद्रव्यथी अने परद्रव्यना सर्व भावोथी रहित होवाथी शुद्ध छे, पोताना स्वरसना प्रवाहथी पूर्ण देदीप्यमान ज्योतिरूप छे अने टंकोत्कीर्ण महिमावाळो छे. एवो ज्ञानपुंज आत्मा प्रगट थाय छे. १९३.
हवे सर्वविशुद्ध ज्ञानने प्रगट करे छे. तेमां प्रथम, ‘आत्मा कर्ता-भोक्ताभावथी रहित छे’ एवा अर्थनो, आगळनी गाथानी सूचनिकारूप श्लोक कहे छेः —
श्लोकार्थः — [कर्तृत्वं अस्य चितः स्वभावः न] कर्तापणुं आ चित्स्वरूप आत्मानो स्वभाव नथी, [वेदयितृत्ववत्] जेम भोक्तापणुं स्वभाव नथी. [अज्ञानात् एव अयं कर्ता] अज्ञानथी ज ते कर्ता छे, [तद्-अभावात् अकारकः] अज्ञाननो अभाव थतां अकर्ता छे. १९४.
हवे आत्मानुं अकर्तापणुं द्रष्टांतपूर्वक कहे छेः —
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