कहानजैनशास्त्रमाळा ]
स्फु रच्चिज्जयोतिर्भिश्छुरितभुवनाभोगभवनः ।
स खल्वज्ञानस्य स्फु रति महिमा कोऽपि गहनः ।।१९५।।
श्लोकार्थः — [स्वरसतः विशुद्धः] जे निजरसथी विशुद्ध छे, अने [स्फु रत्-चित्-ज्योतिर्भिः छुरित-भुवन-आभोग-भवनः] स्फुरायमान थती जेनी चैतन्यज्योतिओ वडे लोकनो समस्त विस्तार व्याप्त थई जाय छे एवो जेनो स्वभाव छे, [अयं जीवः] एवो आ जीव [इति] पूर्वोक्त रीते (परद्रव्यनो अने परभावोनो) [अकर्ता स्थितः] अकर्ता ठर्यो, [तथापि] तोपण [अस्य] तेने [इह] आ जगतमां [प्रकृतिभिः] कर्मप्रकृतिओ साथे [यद् असौ बन्धः किल स्यात्] जे आ (प्रगट) बंध थाय छे [सः खलु अज्ञानस्य कः अपि गहनः महिमा स्फु रति] ते खरेखर अज्ञाननो कोई गहन महिमा स्फुरायमान छे.
भावार्थः — जेनुं ज्ञान सर्व ज्ञेयोमां व्यापनारुं छे एवो आ जीव शुद्धनयथी परद्रव्यनो कर्ता नथी, तोपण तेने कर्मनो बंध थाय छे ते कोई अज्ञाननो गहन महिमा छे — जेनो पार पमातो नथी. १९५.
(हवे आ अज्ञानना महिमाने प्रगट करे छेः — )