अयं हि आसंसारत एव प्रतिनियतस्वलक्षणानिर्ज्ञानेन परात्मनोरेकत्वाध्यासस्य करणात्कर्ता सन् चेतयिता प्रकृतिनिमित्तमुत्पत्तिविनाशावासादयति; प्रकृतिरपि चेतयितृनिमित्तमुत्पत्ति- विनाशावासादयति । एवमनयोरात्मप्रकृत्योः कर्तृकर्मभावाभावेऽप्यन्योन्यनिमित्तनैमित्तिकभावेन द्वयोरपि बन्धो द्रष्टः, ततः संसारः, तत एव च तयोः कर्तृकर्मव्यवहारः ।
गाथार्थः — [चेतयिता तु] चेतक अर्थात् आत्मा [प्रकृत्यर्थम् ] प्रकृतिना निमित्ते [उत्पद्यते] ऊपजे छे [विनश्यति] तथा विणसे छे, [प्रकृतिः अपि] अने प्रकृति पण [चेतकार्थम्] चेतकना अर्थात् आत्माना निमित्ते [उत्पद्यते] ऊपजे छे [विनश्यति] तथा विणसे छे. [एवं] ए रीते [अन्योन्यप्रत्ययात्] परस्पर निमित्तथी [द्वयोः अपि] बन्नेनो — [आत्मनः प्रकृतेः च] आत्मानो ने प्रकृतिनो — [बन्धः तु भवेत्] बंध थाय छे, [तेन] अने तेथी [संसारः] संसार [जायते] उत्पन्न थाय छे.
टीकाः — आ आत्मा, (तेने) अनादि संसारथी ज (परनां अने पोतानां जुदां जुदां) निश्चित स्वलक्षणोनुं ज्ञान (भेदज्ञान) नहि होवाने लीधे परना अने पोताना एकत्वनो अध्यास करवाथी कर्ता थयो थको, प्रकृतिना निमित्ते उत्पत्ति-विनाश पामे छे; प्रकृति पण आत्माना निमित्ते उत्पत्ति-विनाश पामे छे (अर्थात् आत्माना परिणाम अनुसार परिणमे छे). ए रीते — जोके ते आत्मा अने प्रकृतिने कर्ताकर्मभावनो अभाव छे तोपण — परस्पर निमित्तनैमित्तिकभावथी बंनेने बंध जोवामां आवे छे, तेथी संसार छे अने तेथी ज तेमने (आत्माने ने प्रकृतिने) कर्ताकर्मनो व्यवहार छे.
भावार्थः — आत्माने अने ज्ञानावरणादि कर्मनी प्रकृतिओने परमार्थे कर्ताकर्मपणानो अभाव छे तोपण परस्पर निमित्तनैमित्तिकभावने लीधे बंध थाय छे, तेथी संसार छे अने तेथी ज कर्ताकर्मपणानो व्यवहार छे.
(‘ज्यां सुधी आत्मा प्रकृतिना निमित्ते ऊपजवुं-विणसवुं न छोडे त्यां सुधी ते अज्ञानी, मिथ्याद्रष्टि, असंयत छे’ एम हवे कहे छेः — )
४६०