कहानजैनशास्त्रमाळा ]
यावदयं चेतयिता प्रतिनियतस्वलक्षणानिर्ज्ञानात् प्रकृतिस्वभावमात्मनो बन्धनिमित्तं न मुञ्चति, तावत्स्वपरयोरेकत्वज्ञानेनाज्ञायको भवति, स्वपरयोरेकत्वदर्शनेन मिथ्याद्रष्टि- र्भवति, स्वपरयोरेकत्वपरिणत्या चासंयतो भवति; तावदेव च परात्मनोरेकत्वाध्यासस्य करणात्कर्ता
गाथार्थः — [यावत्] ज्यां सुधी [एषः चेतयिता] आ आत्मा [प्रकृत्यर्थं] प्रकृतिना निमित्ते ऊपजवुं-विणसवुं [न एव विमुञ्चति] छोडतो नथी, [तावत्] त्यां सुधी ते [अज्ञायकः] अज्ञायक छे, [मिथ्याद्रष्टिः] मिथ्याद्रष्टि छे, [असंयतः भवेत्] असंयत छे.
[यदा] ज्यारे [चेतयिता] आत्मा [अनन्तक म् कर्मफलम्] अनंत कर्मफळने [विमुञ्चति] छोडे छे, [तदा] त्यारे ते [ज्ञायकः] ज्ञायक छे, [दर्शकः] दर्शक छे, [मुनिः] मुनि छे, [विमुक्तः भवति] विमुक्त (अर्थात् बंधथी रहित) छे.
टीकाः — ज्यां सुधी आ आत्मा, (पोतानां अने परनां जुदां जुदां) निश्चित स्वलक्षणोनुं ज्ञान (भेदज्ञान) नहि होवाने लीधे, प्रकृतिना स्वभावने — के जे पोताने बंधनुं निमित्त छे तेने — छोडतो नथी, त्यां सुधी स्व-परना एकत्वज्ञानथी अज्ञायक छे, स्वपरना एकत्वदर्शनथी (एकत्वरूप श्रद्धानथी) मिथ्याद्रष्टि छे अने स्वपरनी एकत्वपरिणतिथी असंयत