Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 318.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
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मुञ्चति; तथा किलाभव्यः प्रकृतिस्वभावं स्वयमेव न मुञ्चति, प्रकृतिस्वभावमोचन- समर्थद्रव्यश्रुतज्ञानाच्च न मुञ्चति, नित्यमेव भावश्रुतज्ञानलक्षणशुद्धात्मज्ञानाभावेनाज्ञानित्वात् अतो नियम्यतेऽज्ञानी प्रकृतिस्वभावे स्थितत्वाद्वेदक एव

ज्ञानी त्ववेदक एवेति नियम्यते
णिव्वेयसमावण्णो णाणी कम्मप्फलं वियाणेदि
महुरं कडुयं बहुविहमवेयओ तेण सो होइ ।।३१८।।
निर्वेदसमापन्नो ज्ञानी कर्मफलं विजानाति
मधुरं कटुकं बहुविधमवेदकस्तेन स भवति ।।३१८।।

छोडाववाने (मटाडवाने) समर्थ एवा साकरसहित दूधना पानथी पण छोडतो नथी, तेम खरेखर अभव्य प्रकृतिस्वभावने पोतानी मेळे छोडतो नथी अने प्रकृतिस्वभाव छोडाववाने समर्थ एवा द्रव्यश्रुतना ज्ञानथी पण छोडतो नथी; कारण के तेने सदाय, भावश्रुतज्ञानस्वरूप शुद्धात्मज्ञानना (शुद्ध आत्माना ज्ञानना) अभावने लीधे, अज्ञानीपणुं छे. आथी एवो नियम करवामां आवे छे (अर्थात् एवो नियम ठरे छे) के अज्ञानी प्रकृतिस्वभावमां स्थित होवाथी वेदक ज छे (कर्मनो भोक्ता ज छे).

भावार्थःआ गाथामां, अज्ञानी कर्मना फळनो भोक्ता ज छेएवो नियम कह्यो. अहीं अभव्यनुं उदाहरण युक्त छे. अभव्यनो एवो स्वयमेव स्वभाव छे के द्रव्यश्रुतनुं ज्ञान आदि बाह्य कारणो मळवा छतां अभव्य जीव, शुद्ध आत्माना ज्ञानना अभावने लीधे, कर्मना उदयने भोगववानो स्वभाव बदलतो नथी; माटे आ उदाहरणथी स्पष्ट थाय छे के शास्त्रोनुं ज्ञान वगेरे होवा छतां ज्यां सुधी जीवने शुद्ध आत्मानुं ज्ञान नथी अर्थात् अज्ञानीपणुं छे त्यां सुधी ते नियमथी भोक्ता ज छे.

हवे ज्ञानी तो कर्मफळनो अवेदक ज छेएवो नियम करवामां आवे छेः

निर्वेदने पामेल ज्ञानी कर्मफळने जाणतो,
कडवा मधुर बहुविधने, तेथी अवेदक छे अहो! ३१८.

गाथार्थः[निर्वेदसमापन्नः] निर्वेदप्राप्त (वैराग्यने पामेलो) [ज्ञानी] ज्ञानी [मधुरम् कटुकम्] मीठा-कडवा [बहुविधम्] बहुविध [कर्मफलम्] कर्मफळने [विजानाति] जाणे छे [तेन] तेथी [सः] ते [अवेदकः भवति] अवेदक छे.

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