Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 319-320.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
४६७
ण वि कुव्वइ ण वि वेयइ णाणी कम्माइं बहुपयाराइं
जाणइ पुण कम्मफलं बंधं पुण्णं च पावं च ।।३१९।।
नापि करोति नापि वेदयते ज्ञानी कर्माणि बहुप्रकाराणि
जानाति पुनः कर्मफलं बन्धं पुण्यं च पापं च ।।३१९।।

ज्ञानी हि कर्मचेतनाशून्यत्वेन कर्मफलचेतनाशून्यत्वेन च स्वयमकर्तृत्वादवेदयितृत्वाच्च न कर्म करोति न वेदयते च; किन्तु ज्ञानचेतनामयत्वेन केवलं ज्ञातृत्वात्कर्मबन्धं कर्मफलं च शुभमशुभं वा केवलमेव जानाति

कुत एतत् ?
दिट्ठी जहेव णाणं अकारयं तह अवेदयं चेव
जाणइ य बंधमोक्खं कम्मुदयं णिज्जरं चेव ।।३२०।।

करी शके? ज्यां सुधी निर्बळता रहे त्यां सुधी कर्म जोर चलावी ले; क्रमे क्रमे सबळता वधारीने छेवटे ते ज्ञानी कर्मनो निर्मूळ नाश करशे ज. १९८.

हवे आ ज अर्थने फरी द्रढ करे छेः

करतो नथी, नथी वेदतो ज्ञानी करम बहुविधने,
बस जाणतो ए बंध तेम ज कर्मफळ शुभ-अशुभने. ३१९.

गाथार्थः[ज्ञानी] ज्ञानी [बहुप्रकाराणि] बहु प्रकारनां [कर्माणि] कर्मोने [न अपि करोति] करतो पण नथी, [न अपि वेदयते] वेदतो (भोगवतो) पण नथी; [पुनः] परंतु [पुण्यं च पापं च] पुण्य अने पापरूप [बन्धं] कर्मबंधने [कर्मफलं] तथा कर्मफळने [जानाति] जाणे छे.

टीकाःकर्मचेतना रहित होवाने लीधे पोते अकर्ता होवाथी, अने कर्मफळचेतना रहित होवाने लीधे पोते अवेदक (अभोक्ता) होवाथी, ज्ञानी कर्मने करतो नथी तेम ज वेदतो (भोगवतो) नथी; परंतु ज्ञानचेतनामय होवाने लीधे केवळ ज्ञाता ज होवाथी, शुभ अथवा अशुभ कर्मबंधने तथा कर्मफळने केवळ जाणे ज छे.

हवे पूछे छे के(ज्ञानी करतो-भोगवतो नथी, जाणे ज छे) ए कई रीते? तेनो उत्तर द्रष्टांतपूर्वक कहे छेः

ज्यम नेत्र, तेम ज ज्ञान नथी कारक, नथी वेदक अरे!
जाणे ज कर्मोदय, निरजरा, बंध तेम ज मोक्षने. ३२०.