कहानजैनशास्त्रमाळा ]
ज्ञानी हि कर्मचेतनाशून्यत्वेन कर्मफलचेतनाशून्यत्वेन च स्वयमकर्तृत्वादवेदयितृत्वाच्च न कर्म करोति न वेदयते च; किन्तु ज्ञानचेतनामयत्वेन केवलं ज्ञातृत्वात्कर्मबन्धं कर्मफलं च शुभमशुभं वा केवलमेव जानाति ।
करी शके? ज्यां सुधी निर्बळता रहे त्यां सुधी कर्म जोर चलावी ले; क्रमे क्रमे सबळता वधारीने छेवटे ते ज्ञानी कर्मनो निर्मूळ नाश करशे ज. १९८.
हवे आ ज अर्थने फरी द्रढ करे छेः —
गाथार्थः — [ज्ञानी] ज्ञानी [बहुप्रकाराणि] बहु प्रकारनां [कर्माणि] कर्मोने [न अपि करोति] करतो पण नथी, [न अपि वेदयते] वेदतो (भोगवतो) पण नथी; [पुनः] परंतु [पुण्यं च पापं च] पुण्य अने पापरूप [बन्धं] कर्मबंधने [कर्मफलं] तथा कर्मफळने [जानाति] जाणे छे.
टीकाः — कर्मचेतना रहित होवाने लीधे पोते अकर्ता होवाथी, अने कर्मफळचेतना रहित होवाने लीधे पोते अवेदक ( – अभोक्ता) होवाथी, ज्ञानी कर्मने करतो नथी तेम ज वेदतो ( – भोगवतो) नथी; परंतु ज्ञानचेतनामय होवाने लीधे केवळ ज्ञाता ज होवाथी, शुभ अथवा अशुभ कर्मबंधने तथा कर्मफळने केवळ जाणे ज छे.
हवे पूछे छे के — (ज्ञानी करतो-भोगवतो नथी, जाणे ज छे) ए कई रीते? तेनो उत्तर द्रष्टांतपूर्वक कहे छेः —