कहानजैनशास्त्रमाळा ]
छे त्यां सुधी अदर्शन, अज्ञान तथा असमर्थपणुं होय ज छे; तो पछी केवळज्ञान थया पहेलां ज्ञाताद्रष्टापणुं केम कहेवाय?’’ तेनुं समाधानः — पहेलेथी कहेता ज आवीए छीए के जे स्वतंत्रपणे करे-भोगवे, तेने परमार्थे कर्ता-भोक्ता कहेवाय छे. माटे ज्यां मिथ्याद्रष्टिरूप अज्ञाननो अभाव थयो त्यां परद्रव्यना स्वामीपणानो अभाव थयो अने त्यारे जीव ज्ञानी थयो थको स्वतंत्रपणे तो कोईनो कर्ता-भोक्ता थतो नथी, तथा पोतानी नबळाईथी कर्मना उदयनी बळजोरीथी जे कार्य थाय छे तेनो कर्ता-भोक्ता परमार्थद्रष्टिए तेने कहेवातो नथी. वळी ते कार्यना निमित्ते कांईक नवीन कर्मरज लागे पण छे तोपण तेने अहीं बंधमां गणवामां आवती नथी. मिथ्यात्व छे ते ज संसार छे. मिथ्यात्व गया पछी संसारनो अभाव ज थाय छे. समुद्रमां बिंदुनी शी गणतरी?
वळी एटलुं विशेष जाणवुं के — केवळज्ञानी तो साक्षात् शुद्धात्मस्वरूप ज छे अने श्रुतज्ञानी पण शुद्धनयना अवलंबनथी आत्माने एवो ज अनुभवे छे; प्रत्यक्ष - परोक्षनो ज भेद छे. माटे श्रुतज्ञानीने ज्ञान-श्रद्धाननी अपेक्षाए तो ज्ञाताद्रष्टापणुं ज छे अने चारित्रनी अपेक्षाए प्रतिपक्षी कर्मनो जेटलो उदय छे तेटलो घात छे तथा तेने नाश करवानो उद्यम पण छे. ज्यारे ते कर्मनो अभाव थशे त्यारे साक्षात् यथाख्यात चारित्र थशे अने त्यारे केवळज्ञान थशे. अहीं सम्यग्द्रष्टिने ज्ञानी कहेवामां आवे छे ते मिथ्यात्वना अभावनी अपेक्षाए कहेवामां आवे छे. ज्ञानसामान्यनी अपेक्षा लईए तो तो सर्व जीव ज्ञानी छे अने विशेष अपेक्षा लईए तो ज्यां सुधी किंचित्मात्र पण अज्ञान रहे त्यां सुधी ज्ञानी कही शकाय नहि — जेम सिद्धांतमां भावोनुं वर्णन करतां, ज्यां सुधी केवळज्ञान न ऊपजे त्यां सुधी अर्थात् बारमा गुणस्थान सुधी अज्ञानभाव कह्यो छे. माटे अहीं जे ज्ञानी-अज्ञानीपणुं कह्युं ते सम्यक्त्व-मिथ्यात्वनी अपेक्षाए ज जाणवुं.
हवे, जेओ — जैनना साधुओ पण — सर्वथा एकांतना आशयथी आत्माने कर्ता ज माने छे तेमने निषेधतो, आगळनी गाथानी सूचनारूप श्लोक कहे छेः —
श्लोकार्थः — [ये तु तमसा तताः आत्मानं कर्तारम् पश्यन्ति] जेओ अज्ञान-अंधकारथी आच्छादित थया थका आत्माने कर्ता माने छे, [मुमुक्षताम् अपि] तेओ भले मोक्षने इच्छनारा होय तोपण [सामान्यजनवत्] सामान्य (लौकिक) जनोनी माफक [तेषां मोक्षः न] तेमनो पण मोक्ष थतो नथी. १९९.