व्यवहारविमूढो भूत्वा परद्रव्यं ममेदमिति पश्येत् तदा सोऽपि निस्संशयं परद्रव्यमात्मानं कुर्वाणो मिथ्याद्रष्टिरेव स्यात् । अतस्तत्त्वं जानन् पुरुषः सर्वमेव परद्रव्यं न ममेति ज्ञात्वा लोकश्रमणानां द्वयेषामपि योऽयं परद्रव्ये कर्तृव्यवसायः स तेषां सम्यग्दर्शनरहितत्वादेव भवति इति सुनिश्चितं जानीयात् ।
सम्बन्ध एव सकलोऽपि यतो निषिद्धः ।
पश्यन्त्वकर्तृ मुनयश्च जनाश्च तत्त्वम् ।।२०१।।
व्यवहारविमूढ थईने परद्रव्यने ‘आ मारुं छे’ एम देखे तो ते वखते ते पण निःसंशयपणे अर्थात् चोक्कस, परद्रव्यने पोतारूप करतो थको, मिथ्याद्रष्टि ज थाय छे. माटे तत्त्वने जाणनारो पुरुष ‘सघळुंय परद्रव्य मारुं नथी’ एम जाणीने, ‘लोक अने श्रमण — बन्नेने जे आ परद्रव्यमां कर्तृत्वनो व्यवसाय छे ते तेमना सम्यग्दर्शनरहितपणाने लीधे ज छे’ एम सुनिश्चितपणे जाणे छे.
भावार्थः — जे व्यवहारथी मोही थईने परद्रव्यनुं कर्तापणुं माने छे ते — लौकिक जन हो के मुनिजन हो — मिथ्याद्रष्टि ज छे. ज्ञानी पण जो व्यवहारमूढ थईने परद्रव्यने ‘मारुं’ माने तो मिथ्याद्रष्टि ज थाय छे.
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [यतः] कारण के [इह] आ लोकमां [एकस्य वस्तुनः अन्यतरेण सार्धं सकलः अपि सम्बन्धः एव निषिद्धः] एक वस्तुनो अन्य वस्तुनी साथे सघळोय संबंध ज निषेधवामां आव्यो छे, [तत्] तेथी [वस्तुभेदे] ज्यां वस्तुभेद छे अर्थात् भिन्न वस्तुओ छे त्यां [कर्तृकर्मघटना अस्ति न] कर्ताकर्मघटना होती नथी — [मुनयः च जनाः च] एम मुनिजनो अने लौकिक जनो [तत्त्वम् अकर्तृ पश्यन्तु] तत्त्वने (वस्तुना यथार्थ स्वरूपने) अकर्ता देखो ( — कोई कोईनुं कर्ता नथी, परद्रव्य परनुं अकर्ता ज छे – एम श्रद्धामां लावो). २०१.
‘‘जे पुरुषो आवो वस्तुस्वभावनो नियम जाणता नथी तेओ अज्ञानी थया थका कर्मने करे छे; ए रीते भावकर्मनो कर्ता अज्ञानथी चेतन ज थाय छे.’’ — आवा अर्थनुं, आगळनी गाथाओनी सूचनारूप काव्य हवे कहे छेः —
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