कहानजैनशास्त्रमाळा ]
नथी, [यस्मात्] कारण के [कर्म च एव हि] कर्म ज [कर्म अभिलषति] कर्मनी अभिलाषा करे छे [इति भणितम्] एम कह्युं छे.
वळी, [यस्मात् परं हन्ति] जे परने हणे छे [च] अने [परेण हन्यते] जे परथी हणाय छे [सा प्रकृतिः] ते प्रकृति छे — [एतेन अर्थेन किल] ए अर्थमां [परघातनाम इति भण्यते] परघातनामकर्म कहेवामां आवे छे, [तस्मात्] तेथी [अस्माकम् उपदेशे] अमारा उपदेशमां [कः अपि जीवः] कोई पण जीव [उपघातकः न अस्ति] उपघातक (हणनार) नथी [यस्मात्] कारण के [कर्म च एव हि] कर्म ज [कर्म हन्ति] कर्मने हणे छे [इति भणितम्] एम कह्युं छे.’’
(आचार्यभगवान कहे छे केः — ) [एवं तु] आ प्रमाणे [ईद्रशं साङ्खयोपदेशं] आवो सांख्यमतनो उपदेश [ये श्रमणाः] जे श्रमणो (जैन मुनिओ) [प्ररूपयन्ति] प्ररूपे छे [तेषां] तेमना मतमां [प्रकृतिः करोति] प्रकृति ज करे छे [आत्मानः च सर्वे] अने आत्माओ तो सर्वे [अकारकाः] अकारक छे एम ठरे छे!
[अथवा] अथवा (कर्तापणानो पक्ष साधवाने) [मन्यसे] जो तुं एम माने के ‘[मम आत्मा] मारो आत्मा [आत्मनः] पोताना [आत्मानम्] (द्रव्यरूप) आत्माने [करोति] करे छे’, [एतत् जानतः तव] तो एवुं जाणनारनो तारो [एषः मिथ्यास्वभावः] ए मिथ्यास्वभाव छे (अर्थात् एम जाणवुं ते तारो मिथ्यास्वभाव छे); [यद्] कारण के — [समये] सिद्धांतमां [आत्मा] आत्माने [नित्यः] नित्य, [असङ्खयेयप्रदेशः] असंख्यात-प्रदेशी [दर्शितः तु] बताव्यो छे, [ततः] तेनाथी [सः] तेने [हीनः अधिकः च] हीन-अधिक [कर्तुं न अपि शक्यते] करी शकातो नथी; [विस्तरतः] वळी