Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 485 of 642
PDF/HTML Page 516 of 673

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
४८५

करोति, चारित्रमोहाख्यकर्मोदयमन्तरेण तदनुपपत्तेः कर्मैवोर्ध्वाधस्तिर्यग्लोकं भ्रमयति, आनुपूर्व्याख्यकर्मोदयमन्तरेण तदनुपपत्तेः अपरमपि यद्यावत्किञ्चिच्छुभाशुभं तत्तावत्सकलमपि कर्मैव करोति, प्रशस्ताप्रशस्तरागाख्यकर्मोदयमन्तरेण तदनुपपत्तेः यत एवं समस्तमपि स्वतन्त्रं कर्म करोति, कर्म ददाति, कर्म हरति च, ततः सर्व एव जीवाः नित्यमेवैकान्तेनाकर्तार एवेति निश्चिनुमः किञ्च--श्रुतिरप्येनमर्थमाह; पुंवेदाख्यं कर्म स्त्रियमभिलषति, स्त्रीवेदाख्यं कर्म पुमांसमभिलषति इति वाक्येन कर्मण एव कर्माभिलाषकर्तृत्वसमर्थनेन जीवस्याब्रह्मकर्तृत्व- प्रतिषेधात्, तथा यत्परं हन्ति, येन च परेण हन्यते तत्परघातकर्मेति वाक्येन कर्मण एव कर्मघातकर्तृत्वसमर्थनेन जीवस्य घातकर्तृत्वप्रतिषेधाच्च सर्वथैवाकर्तृत्वज्ञापनात् एवमीद्रशं सांख्यसमयं स्वप्रज्ञापराधेन सूत्रार्थमबुध्यमानाः केचिच्छ्रमणाभासाः प्ररूपयन्ति; तेषां प्रकृतेरेकान्तेन करे छे, कारण के मिथ्यात्वकर्मना उदय विना तेनी अनुपपत्ति छे; कर्म ज असंयमी करे छे, कारण के चारित्रमोह नामना कर्मना उदय विना तेनी अनुपपत्ति छे; कर्म ज ऊर्ध्वलोकमां, अधोलोकमां अने तिर्यग्लोकमां भमावे छे, कारण के आनुपूर्वी नामना कर्मना उदय विना तेनी अनुपपत्ति छे; बीजुं पण जे कांई पण जेटलुं शुभ-अशुभ छे ते बधुंय कर्म ज करे छे, कारण के प्रशस्त-अप्रशस्त राग नामना कर्मना उदय विना तेनी अनुपपत्ति छे. ए रीते बधुंय स्वतंत्रपणे कर्म ज करे छे, कर्म ज आपे छे, कर्म ज हरी ले छे, तेथी अमे एम निश्चय करीए छीए केसर्वे जीवो सदाय एकांते अकर्ता ज छे. वळी श्रुति (भगवाननी वाणी, शास्त्र) पण ए ज अर्थने कहे छे; कारण के, (ते श्रुति) ‘पुरुषवेद नामनुं कर्म स्त्रीनी अभिलाषा करे छे अने स्त्रीवेद नामनुं कर्म पुरुषनी अभिलाषा करे छे’ ए वाक्यथी कर्मने ज कर्मनी अभिलाषाना कर्तापणाना समर्थन वडे जीवने अब्रह्मचर्यना कर्तापणानो निषेध करे छे, तथा ‘जे परने हणे छे अने जे परथी हणाय छे ते परघातकर्म छे’ ए वाक्यथी कर्मने ज कर्मना घातनुं कर्तापणुं होवाना समर्थन वडे जीवने घातना कर्तापणानो निषेध करे छे, अने ए रीते (अब्रह्मचर्यना तथा घातना कर्तापणाना निषेध द्वारा) जीवनुं सर्वथा ज अकर्तापणुं जणावे छे.’’

(आचार्यदेव कहे छे केः) आ प्रमाणे आवा सांख्यमतने, पोतानी प्रज्ञाना (बुद्धिना) अपराधथी सूत्रना अर्थने नहि जाणनारा केटलाक *श्रमणाभासो प्ररूपे छे; तेमनी, एकांते प्रकृतिना कर्तापणानी मान्यताथी, समस्त जीवोने एकांते अकर्तापणुं आवी पडे छे तेथी ‘जीव

* श्रमणाभास = मुनिना गुणो नहि होवा छतां पोताने मुनि कहेवरावनार