कहानजैनशास्त्रमाळा ]
निजमनसि विधत्ते कर्तृभोक्त्रोर्विभेदम् ।
स्वयमयमभिषिञ्चंश्चिच्चमत्कार एव ।।२०६।।
एनम्] उद्धत *ज्ञानधाममां निश्चित एवा आ स्वयं प्रत्यक्ष आत्माने [च्युत-कर्तृभावम् अचलं एकं परम् ज्ञातारम्] कर्तापणा विनानो, अचळ, एक परम ज्ञाता ज [पश्यन्तु] देखो.
भावार्थः — सांख्यमतीओ पुरुषने सर्वथा एकांतथी अकर्ता, शुद्ध उदासीन चैतन्यमात्र माने छे. आवुं मानवाथी पुरुषने संसारना अभावनो प्रसंग आवे छे; अने जो प्रकृतिने संसार मानवामां आवे तो ते पण घटतुं नथी, कारण के प्रकृति तो जड छे, तेने सुखदुःख आदिनुं संवेदन नथी, तेने संसार केवो? आवा अनेक दोषो एकांत मान्यतामां आवे छे. सर्वथा एकांत वस्तुनुं स्वरूप ज नथी. माटे सांख्यमतीओ मिथ्याद्रष्टि छे; अने जो जैनो पण एवुं माने तो तेओ पण मिथ्याद्रष्टि छे. तेथी आचार्यदेव उपदेश करे छे के — सांख्यमतीओनी माफक जैनो आत्माने सर्वथा अकर्ता न मानो; ज्यां सुधी स्वपरनुं भेदविज्ञान न होय त्यां सुधी तो तेने रागादिकनो — पोतानां चेतनरूप भावकर्मोनो — कर्ता मानो, अने भेदविज्ञान थया पछी शुद्ध विज्ञानघन, समस्त कर्तापणाना भावथी रहित, एक ज्ञाता ज मानो. आम एक ज आत्मामां कर्तापणुं तथा अकर्तापणुं — ए बन्ने भावो विवक्षावश सिद्ध थाय छे. आवो स्याद्वाद मत जैनोनो छे; अने वस्तुस्वभाव पण एवो ज छे, कल्पना नथी. आवुं (स्याद्वाद अनुसार) मानवाथी पुरुषने संसार-मोक्ष आदिनी सिद्धि थाय छे; सर्वथा एकांत मानवाथी सर्व निश्चय-व्यवहारनो लोप थाय छे. २०५.
हवेनी गाथाओमां, ‘कर्ता अन्य छे अने भोक्ता अन्य छे’ एवुं माननारा क्षणिकवादी बौद्धमतीओने तेमनी सर्वथा एकांत मान्यतामां दूषण बतावशे अने स्याद्वाद अनुसार जे रीते वस्तुस्वरूप अर्थात् कर्ताभोक्तापणुं छे ते रीते कहेशे. ते गाथाओनी सूचनानुं काव्य प्रथम कहे छेः —
श्लोकार्थः — [इह] आ जगतमां [एकः] कोई एक तो (अर्थात् क्षणिकवादी बौद्धमती तो) [इदम् आत्मतत्त्वं क्षणिकम् कल्पयित्वा] आ आत्मतत्त्वने क्षणिक कल्पीने [निज-मनसि] पोताना मनमां [कर्तृ-भोक्त्रोः विभेदं विधत्ते] कर्ता अने भोक्तानो भेद करे छे ( – अन्य कर्ता छे अने अन्य भोक्ता छे एवुं माने छे); [तस्य विमोहं] तेना मोहने (अज्ञानने) [अयम् चित्-चमत्कारः
* ज्ञानधाम = ज्ञानमंदिर; ज्ञानप्रकाश.