एव स्वयम्] आ चैतन्यचमत्कार ज पोते [नित्य-अमृत-ओघैः] नित्यतारूप अमृतना ओघ ( – समूहो) वडे [अभिषिञ्चन्] अभिसिंचन करतो थको, [अपहरति] दूर करे छे.
भावार्थः — क्षणिकवादी कर्ता-भोक्तामां भेद माने छे, अर्थात् पहेली क्षणे जे आत्मा हतो ते बीजी क्षणे नथी — एम माने छे. आचार्यदेव कहे छे के — अमे तेने शुं समजावीए? आ चैतन्य ज तेनुं अज्ञान दूर करशे — के जे (चैतन्य) अनुभवगोचर नित्य छे. पहेली क्षणे जे आत्मा हतो ते ज बीजी क्षणे कहे छे के ‘हुं पहेलां हतो ते ज छुं’; आवुं स्मरणपूर्वक प्रत्यभिज्ञान आत्मानी नित्यता बतावे छे. अहीं बौद्धमती कहे छे के — ‘जे पहेली क्षणे हतो ते ज हुं बीजी क्षणे छुं’ एवुं मानवुं ते तो अनादि अविद्याथी भ्रम छे; ए भ्रम मटे त्यारे तत्त्व सिद्ध थाय, समस्त क्लेश मटे. तेनो उत्तर आपवामां आवे छे के — ‘‘हे बौद्ध! तुं आ जे दलील करे छे ते आखी दलील करनार एक ज आत्मा छे के अनेक आत्माओ छे? वळी तारी आखी दलील एक ज आत्मा सांभळे छे एम मानीने तुं दलील करे छे के आखी दलील पूरी थतां सुधीमां अनेक आत्माओ पलटाई जाय छे एम मानीने दलील करे छे? जो अनेक आत्माओ पलटाई जता होय तो तारी आखी दलील तो कोई आत्मा सांभळतो नथी; तो पछी दलील करवानुं प्रयोजन शुं?* आम अनेक रीते विचारी जोतां तने जणाशे के आत्माने क्षणिक मानीने प्रत्यभिज्ञानने भ्रम कही देवो ते यथार्थ नथी. माटे एम समजवुं के — आत्माने एकांते नित्य के एकांते अनित्य मानवो ते बन्ने भ्रम छे, वस्तुस्वरूप नथी; अमे (जैनो) कथंचित् नित्यानित्यात्मक वस्तुस्वरूप कहीए छीए ते ज सत्यार्थ छे’’. २०६.
फरी, क्षणिकवादने युक्ति वडे निषेधतुं, आगळनी गाथाओनी सूचनारूप काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [वृत्ति-अंश-भेदतः] वृत्त्यंशोना अर्थात् पर्यायोना भेदने लीधे [अत्यन्तं वृत्तिमत्-नाश-कल्पनात्] ‘वृत्तिमान अर्थात् द्रव्य अत्यंत (सर्वथा) नाश पामे छे’ एवी कल्पना द्वारा [अन्यः करोति] ‘अन्य करे छे अने [अन्यः भुंक्ते] अन्य भोगवे छे’ [इति एकान्तः मा चकास्तु] एवो एकांत न प्रकाशो.
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* जो एम कहेवामां आवे के ‘आत्मा तो नाश पामे छे पण ते संस्कार मूकतो जाय छे’ तो ते पण यथार्थ
नथी; आत्मा नाश पामे तो आधार विना संस्कार केम रही शके? वळी कदापि एक आत्मा संस्कार मूकतो
जाय, तोपण ते आत्माना संस्कार बीजा आत्मामां पेसी जाय एवो नियम न्यायसंगत नथी.