Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 345-348.

< Previous Page   Next Page >


Page 491 of 642
PDF/HTML Page 522 of 673

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
४९१
केहिंचि दु पज्जएहिं विणस्सए णेव केहिंचि दु जीवो
जम्हा तम्हा कुव्वदि सो वा अण्णो व णेयंतो ।।३४५।।
केहिंचि दु पज्जएहिं विणस्सए णेव केहिंचि दु जीवो
जम्हा तम्हा वेददि सो वा अण्णो व णेयंतो ।।३४६।।
जो चेव कुणदि सो चिय ण वेदए जस्स एस सिद्धंतो
सो जीवो णादव्वो मिच्छादिट्ठी अणारिहदो ।।३४७।।
अण्णो करेदि अण्णो परिभुंजदि जस्स एस सिद्धंतो
सो जीवो णादव्वो मिच्छादिट्ठी अणारिहदो ।।३४८।।
कैश्चित्तु पर्यायैर्विनश्यति नैव कैश्चित्तु जीवः
यस्मात्तस्मात्करोति स वा अन्यो वा नैकान्तः ।।३४५।।

भावार्थःद्रव्यनी अवस्थाओ क्षणे क्षणे नाश पामती होवाथी बौद्धमती एम माने छे के ‘द्रव्य ज सर्वथा नाश पामे छे’. आवी एकांत मान्यता मिथ्या छे. जो अवस्थावान पदार्थनो नाश थाय तो अवस्था कोना आश्रये थाय? ए रीते बन्नेना नाशनो प्रसंग आववाथी शून्यनो प्रसंग आवे छे. २०७.

हवे गाथाओमां अनेकांतने प्रगट करीने क्षणिकवादने स्पष्ट रीते निषेधे छेः

पर्याय कंईकथी विणसे जीव, कंईकथी नहि विणसे,
तेथी करे छे ते ज के बीजोनहीं एकांत छे. ३४५.
पर्याय कंईकथी विणसे जीव, कंईकथी नहि विणसे,
जीव तेथी वेदे ते ज के बीजोनहीं एकांत छे. ३४६.
जीव जे करे ते भोगवे नहिजेहनो सिद्धांत ए,
ते जीव मिथ्याद्रष्टि छे, अर्हंतना मतनो नथी. ३४७.
जीव अन्य करतो, अन्य वेदेजेहनो सिद्धांत ए,
ते जीव मिथ्याद्रष्टि छे, अर्हंतना मतनो नथी. ३४८.

गाथार्थः[यस्मात्] कारण के [जीवः] जीव [कैश्चित् पर्यायैः तु] केटलाक पर्यायोथी