यतो हि प्रतिसमयं सम्भवदगुरुलघुगुणपरिणामद्वारेण क्षणिकत्वादचलितचैतन्यान्वय-
गुणद्वारेण नित्यत्वाच्च जीवः कैश्चित्पर्यायैर्विनश्यति, कैश्चित्तु न विनश्यतीति द्विस्वभावो जीवस्वभावः । ततो य एव करोति स एवान्यो वा वेदयते, य एव वेदयते, स एवान्यो वा [विनश्यति] नाश पामे छे [तु] अने [कैश्चित्] केटलाक पर्यायोथी [न एव] नथी नाश पामतो,
[तस्मात्] तेथी [सः वा करोति] ‘(जे भोगवे छे) ते ज करे छे’ [अन्यः वा] अथवा ‘बीजो
ज करे छे’ [न एकान्तः] एवो एकांत नथी ( – स्याद्वाद छे).
[यस्मात्] कारण के [जीवः] जीव [कैश्चित् पर्यायैः तु] केटलाक पर्यायोथी [विनश्यति] नाश पामे छे [तु] अने [कैश्चित्] केटलाक पर्यायोथी [न एव] नथी नाश पामतो, [तस्मात्] तेथी [सः वा वेदयते] ‘(जे करे छे) ते ज भोगवे छे’ [अन्यः वा] अथवा ‘बीजो ज भोगवे छे’ [न एकान्तः] एवो एकांत नथी ( – स्याद्वाद छे).
‘[यः च एव करोति] जे करे छे [सः च एव न वेदयते] ते ज नथी भोगवतो’ [एषः यस्य सिद्धान्तः] एवो जेनो सिद्धांत छे, [सः जीवः] ते जीव [मिथ्याद्रष्टिः] मिथ्याद्रष्टि, [अनार्हतः] अनार्हत ( – अर्हत्ना मतने नहि माननारो) [ज्ञातव्यः] जाणवो.
‘[अन्यः करोति] बीजो करे छे [अन्यः परिभुंक्ते] अने बीजो भोगवे छे’ [एषः यस्य सिद्धान्तः] एवो जेनो सिद्धांत छे, [सः जीवः] ते जीव [मिथ्याद्रष्टिः] मिथ्याद्रष्टि, [अनार्हतः] अनार्हत ( – अजैन) [ज्ञातव्यः] जाणवो.
टीकाः — जीव, प्रतिसमये संभवता ( – दरेक समये थता) अगुरुलघुगुणना परिणाम द्वारा क्षणिक होवाथी अने अचलित चैतन्यना अन्वयरूप गुण द्वारा नित्य होवाथी, केटलाक पर्यायोथी विनाश पामे छे अने केटलाक पर्यायोथी नथी विनाश पामतो — एम बे स्वभाववाळो जीवस्वभाव छे; तेथी ‘जे करे छे ते ज भोगवे छे’ अथवा ‘बीजो ज भोगवे छे’, ‘जे भोगवे
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