कहानजैनशास्त्रमाळा ]
करोतीति नास्त्येकान्तः । एवमनेकान्तेऽपि यस्तत्क्षणवर्तमानस्यैव परमार्थसत्त्वेन वस्तुत्वमिति
वस्त्वंशेऽपि वस्तुत्वमध्यास्य शुद्धनयलोभाद्रजुसूत्रैकान्ते स्थित्वा य एव करोति स एव न वेदयते,
अन्यः करोति अन्यो वेदयते इति पश्यति स मिथ्याद्रष्टिरेव द्रष्टव्यः, क्षणिकत्वेऽपि वृत्त्यंशानां
वृत्तिमतश्चैतन्यचमत्कारस्य टङ्कोत्कीर्णस्यैवान्तःप्रतिभासमानत्वात् ।
छे ते ज करे छे’ अथवा ‘बीजो ज करे छे’ — एवो एकांत नथी. आम अनेकांत होवा छतां, ‘जे (पर्याय) ते क्षणे वर्ते छे, तेने ज परमार्थ सत्पणुं होवाथी, ते ज वस्तु छे’ एम वस्तुना अंशमां वस्तुपणानो अध्यास करीने शुद्धनयना लोभथी ॠजुसूत्रनयना एकांतमां रहीने जे एम देखे – माने छे के ‘‘जे करे छे ते ज नथी भोगवतो, बीजो करे छे अने बीजो भोगवे छे’’, ते जीव मिथ्याद्रष्टि ज देखवो – मानवो; कारण के, वृत्त्यंशोनुं (पर्यायोनुं) क्षणिकपणुं होवा छतां, वृत्तिमान (पर्यायी) जे चैतन्यचमत्कार (आत्मा) ते तो टंकोत्कीर्ण (नित्य) ज अंतरंगमां प्रतिभासे छे.
भावार्थः — वस्तुनो स्वभाव जिनवाणीमां द्रव्यपर्यायस्वरूप कह्यो छे; माटे स्याद्वादथी एवो अनेकांत सिद्ध थाय छे के पर्याय-अपेक्षाए तो वस्तु क्षणिक छे अने द्रव्य- अपेक्षाए नित्य छे. जीव पण वस्तु होवाथी द्रव्यपर्यायस्वरूप छे. तेथी, पर्यायद्रष्टिए जोवामां आवे तो कार्यने करे छे एक पर्याय, अने भोगवे छे अन्य पर्याय; जेम के — मनुष्यपर्याये शुभाशुभ कर्म कर्यां अने तेनुं फळ देवादिपर्याये भोगव्युं. द्रव्यद्रष्टिए जोवामां आवे तो, जे करे छे ते ज भोगवे छे; जेम के — मनुष्यपर्यायमां जे जीवद्रव्ये शुभाशुभ कर्म कर्यां, ते ज जीवद्रव्ये देवादि पर्यायमां पोते करेलां कर्मनुं फळ भोगव्युं.
आ रीते वस्तुनुं स्वरूप अनेकांतरूप सिद्ध होवा छतां, जे जीव शुद्धनयने समज्या विना शुद्धनयना लोभथी वस्तुना एक अंशने ( – वर्तमान काळमां वर्तता पर्यायने) ज वस्तु मानी ॠजुसूत्रनयना विषयनो एकांत पकडी एम माने छे के ‘जे करे छे ते ज भोगवतो नथी — अन्य भोगवे छे, अने जे भोगवे छे ते ज करतो नथी — अन्य करे छे’, ते जीव मिथ्याद्रष्टि छे, अर्हंतना मतनो नथी; कारण के, पर्यायोनुं क्षणिकपणुं होवा छतां, द्रव्यरूप चैतन्यचमत्कार तो अनुभवगोचर नित्य छे; प्रत्यभिज्ञानथी जणाय छे के ‘बाळक अवस्थामां जे हुं हतो ते ज हुं तरुण अवस्थामां हतो अने ते ज हुं वृद्ध अवस्थामां छुं’. आ रीते जे कथंचित् नित्यरूपे अनुभवगोचर छे — स्वसंवेदनमां आवे छे अने जेने जिनवाणी पण एवो ज गाय छे, तेने जे न माने ते मिथ्याद्रष्टि छे एम जाणवुं.
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः —