कहानजैनशास्त्रमाळा ]
कल्प्येरन् । एवमात्मा प्रदीपवत् परं प्रति उदासीनो नित्यमेवेति वस्तुस्थितिः, तथापि यद्रागद्वेषौ तदज्ञानम् ।
यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीपः प्रकाश्यादिव ।
रागद्वेषमयीभवन्ति सहजां मुञ्चन्त्युदासीनताम् ।।२२२।।
आ रीते आत्मा दीवानी जेम पर प्रत्ये सदाय उदासीन छे (अर्थात् संबंध वगरनो, तटस्थ छे) — एवी वस्तुस्थिति छे, तोपण जे रागद्वेष थाय छे ते अज्ञान छे.
भावार्थः — शब्दादिक जड पुद्गलद्रव्यना गुणो छे. तेओ आत्माने कांई कहेतां नथी, के ‘तुं अमने ग्रहण कर (अर्थात् तुं अमने जाण)’; अने आत्मा पण पोताना स्थानथी च्युत थईने तेमने ग्रहवा ( – जाणवा) तेमना प्रत्ये जतो नथी. जेम शब्दादिक समीप न होय त्यारे आत्मा पोताना स्वरूपथी ज जाणे छे, तेम शब्दादिक समीप होय त्यारे पण आत्मा पोताना स्वरूपथी ज जाणे छे. आम पोताना स्वरूपथी ज जाणता एवा आत्माने पोतपोताना स्वभावथी ज परिणमतां शब्दादिक किंचित्मात्र पण विकार करतां नथी, जेम पोताना स्वरूपथी ज प्रकाशता एवा दीवाने घटपटादि पदार्थो विकार करता नथी तेम. आवो वस्तुस्वभाव छे, तोपण जीव शब्दने सांभळी, रूपने देखी, गंधने सूंघी, रसने आस्वादी, स्पर्शने स्पर्शी, गुण- द्रव्यने जाणी, तेमने सारां-नरसां मानी रागद्वेष करे छे, ते अज्ञान ज छे.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [पूर्ण-एक-अच्युत-शुद्ध-बोध-महिमा अयं बोधः] पूर्ण, एक, अच्युत अने शुद्ध ( – विकार रहित) एवुं ज्ञान जेनो महिमा छे एवो आ ज्ञायक आत्मा [ततः इतः बोध्यात्] ते (असमीपवर्ती) के आ (समीपवर्ती) ज्ञेय पदार्थोथी [काम् अपि विक्रियां न यायात्] जरा पण विक्रिया पामतो नथी, [दीपः प्रकाश्यात् इव] जेम दीवो प्रकाश्य पदार्थोथी ( – प्रकाशावायोग्य घटपटादि पदार्थोथी) विक्रिया पामतो नथी तेम. तो पछी [तद्-वस्तुस्थिति-बोध-बन्ध्य-धिषणाः एते अज्ञानिनः] एवी वस्तुस्थितिना ज्ञानथी रहित जेमनी बुद्धि छे एवा आ अज्ञानी जीवो [किम् सहजाम् उदासीनताम् मुञ्चन्ति, रागद्वेषमयीभवन्ति] पोतानी सहज उदासीनताने केम छोडे छे अने रागद्वेषमय केम थाय छे? (एम आचार्यदेवे शोच कर्यो छे.)