Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 222.

< Previous Page   Next Page >


Page 531 of 642
PDF/HTML Page 562 of 673

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५३१

कल्प्येरन् एवमात्मा प्रदीपवत् परं प्रति उदासीनो नित्यमेवेति वस्तुस्थितिः, तथापि यद्रागद्वेषौ तदज्ञानम्

(शार्दूलविक्रीडित)
पूर्णैकाच्युतशुद्धबोधमहिमा बोधो न बोध्यादयं
यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीपः प्रकाश्यादिव
तद्वस्तुस्थितिबोधवन्ध्यधिषणा एते किमज्ञानिनो
रागद्वेषमयीभवन्ति सहजां मुञ्चन्त्युदासीनताम्
।।२२२।।

आ रीते आत्मा दीवानी जेम पर प्रत्ये सदाय उदासीन छे (अर्थात् संबंध वगरनो, तटस्थ छे)एवी वस्तुस्थिति छे, तोपण जे रागद्वेष थाय छे ते अज्ञान छे.

भावार्थःशब्दादिक जड पुद्गलद्रव्यना गुणो छे. तेओ आत्माने कांई कहेतां नथी, के ‘तुं अमने ग्रहण कर (अर्थात् तुं अमने जाण)’; अने आत्मा पण पोताना स्थानथी च्युत थईने तेमने ग्रहवा (जाणवा) तेमना प्रत्ये जतो नथी. जेम शब्दादिक समीप न होय त्यारे आत्मा पोताना स्वरूपथी ज जाणे छे, तेम शब्दादिक समीप होय त्यारे पण आत्मा पोताना स्वरूपथी ज जाणे छे. आम पोताना स्वरूपथी ज जाणता एवा आत्माने पोतपोताना स्वभावथी ज परिणमतां शब्दादिक किंचित्मात्र पण विकार करतां नथी, जेम पोताना स्वरूपथी ज प्रकाशता एवा दीवाने घटपटादि पदार्थो विकार करता नथी तेम. आवो वस्तुस्वभाव छे, तोपण जीव शब्दने सांभळी, रूपने देखी, गंधने सूंघी, रसने आस्वादी, स्पर्शने स्पर्शी, गुण- द्रव्यने जाणी, तेमने सारां-नरसां मानी रागद्वेष करे छे, ते अज्ञान ज छे.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः[पूर्ण-एक-अच्युत-शुद्ध-बोध-महिमा अयं बोधः] पूर्ण, एक, अच्युत अने शुद्ध (विकार रहित) एवुं ज्ञान जेनो महिमा छे एवो आ ज्ञायक आत्मा [ततः इतः बोध्यात्] ते (असमीपवर्ती) के आ (समीपवर्ती) ज्ञेय पदार्थोथी [काम् अपि विक्रियां न यायात्] जरा पण विक्रिया पामतो नथी, [दीपः प्रकाश्यात् इव] जेम दीवो प्रकाश्य पदार्थोथी (प्रकाशावायोग्य घटपटादि पदार्थोथी) विक्रिया पामतो नथी तेम. तो पछी [तद्-वस्तुस्थिति-बोध-बन्ध्य-धिषणाः एते अज्ञानिनः] एवी वस्तुस्थितिना ज्ञानथी रहित जेमनी बुद्धि छे एवा आ अज्ञानी जीवो [किम् सहजाम् उदासीनताम् मुञ्चन्ति, रागद्वेषमयीभवन्ति] पोतानी सहज उदासीनताने केम छोडे छे अने रागद्वेषमय केम थाय छे? (एम आचार्यदेवे शोच कर्यो छे.)