पूर्वागामिसमस्तकर्मविकला भिन्नास्तदात्वोदयात् ।
विन्दन्ति स्वरसाभिषिक्तभुवनां ज्ञानस्य सञ्चेतनाम् ।।२२३।।
भावार्थः — ज्ञाननो स्वभाव ज्ञेयने जाणवानो ज छे, जेम दीपकनो स्वभाव घटपटादिने प्रकाशवानो छे. एवो वस्तुस्वभाव छे. ज्ञेयने जाणवामात्रथी ज्ञानमां विकार थतो नथी. ज्ञेयोने जाणी, तेमने सारां-नरसां मानी, आत्मा रागीद्वेषी – विकारी थाय छे ते अज्ञान छे. माटे आचार्यदेवे शोच कर्यो छे के — ‘वस्तुनो स्वभाव तो आवो छे, छतां आ आत्मा अज्ञानी थईने रागद्वेषरूपे केम परिणमे छे? पोतानी स्वाभाविक उदासीन-अवस्थारूप केम रहेतो नथी?’ आ प्रमाणे आचार्यदेवे जे शोच कर्यो छे ते युक्त छे, कारण के ज्यां सुधी शुभ राग छे त्यां सुधी प्राणीओने अज्ञानथी दुःखी देखी करुणा ऊपजे छे अने तेथी शोच थाय छे. २२२.
हवे आगळना कथननी सूचनारूप काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [राग-द्वेष-विभाव-मुक्त-महसः] जेमनुं तेज रागद्वेषरूप विभावथी रहित छे, [नित्यं स्वभाव-स्पृशः] जेओ सदा (पोताना चैतन्यचमत्कारमात्र) स्वभावने स्पर्शनारा छे, [पूर्व- आगामि-समस्त-कर्म-विकलाः] जेओ भूत काळनां तेम ज भविष्य काळनां समस्त कर्मथी रहित छे अने [तदात्व-उदयात्-भिन्नाः] जेओ वर्तमान काळना कर्मोदयथी भिन्न छे, [दूर-आरूढ-चरित्र- वैभव-बलात् ज्ञानस्य सञ्चेतनाम् विन्दन्ति] तेओ ( – एवा ज्ञानीओ – ) अति प्रबळ चारित्रना वैभवना बळथी ज्ञाननी संचेतनाने अनुभवे छे — [चञ्चत्-चिद्-अर्चिर्मयीं] के जे ज्ञान-चेतना चमकती चैतन्यज्योतिमय छे अने [स्व-रस-अभिषिक्त-भुवनाम्] जेणे निज रसथी (पोताना ज्ञानरूप रसथी) समस्त लोकने सिंच्यो छे.
भावार्थः — जेमने रागद्वेष गया, पोताना चैतन्यस्वभावनो अंगीकार थयो अने अतीत, अनागत तथा वर्तमान कर्मनुं ममत्व गयुं एवा ज्ञानीओ सर्व परद्रव्यथी जुदा थईने चारित्र अंगीकार करे छे. ते चारित्रना बळथी, कर्मचेतना अने कर्मफळचेतनाथी जुदी जे पोतानी चैतन्यना परिणमनस्वरूप ज्ञानचेतना तेनुं अनुभवन करे छे.
अहीं तात्पर्य आम जाणवुंः — जीव पहेलां तो कर्मचेतना अने कर्मफळचेतनाथी भिन्न पोतानी ज्ञानचेतनानुं स्वरूप आगम-प्रमाण, अनुमान-प्रमाण अने स्वसंवेदन-प्रमाणथी जाणे छे अने तेनुं श्रद्धान (प्रतीति) द्रढ करे छे; ए तो अविरत, देशविरत अने प्रमत्त
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