Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 383-385.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५३३
कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं
तत्तो णियत्तदे अप्पयं तु जो सो पडिक्कमणं ।।३८३।।
कम्मं जं सुहमसुहं जम्हि य भावम्हि बज्झदि भविस्सं
तत्तो णियत्तदे जो सो पच्चक्खाणं हवदि चेदा ।।३८४।।
जं सुहमसुहमुदिण्णं संपडि य अणेयवित्थरविसेसं
तं दोसं जो चेददि सो खलु आलोयणं चेदा ।।३८५।।

अवस्थामां पण थाय छे. अने ज्यारे अप्रमत्त अवस्था थाय छे त्यारे जीव पोताना स्वरूपनुं ज ध्यान करे छे; ते वखते, जे ज्ञानचेतनानुं तेणे प्रथम श्रद्धान कर्युं हतुं तेमां ते लीन थाय छे अने श्रेणि चडी, केवळज्ञान उपजावी, साक्षात् *ज्ञानचेतनारूप थाय छे. २२३.

अतीत कर्म प्रत्ये ममत्व छोडे ते आत्मा प्रतिक्रमण छे, अनागत कर्म न करवानी प्रतिज्ञा करे (अर्थात् जे भावोथी आगामी कर्म बंधाय ते भावोनुं ममत्व छोडे) ते आत्मा प्रत्याख्यान छे अने उदयमां आवेला वर्तमान कर्मनुं ममत्व छोडे ते आत्मा आलोचना छे; सदाय आवां प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान अने आलोचनापूर्वक वर्ततो आत्मा चारित्र छे.आवुं चारित्रनुं विधान हवेनी गाथाओमां कहे छेः

शुभ ने अशुभ अनेकविध पूर्वे करेलुं कर्म जे,
तेथी निवर्ते आत्मने, ते आतमा प्रतिक्रमण छे; ३८३.
शुभ ने अशुभ भावी करम जे भावमां बंधाय छे,
तेथी निवर्तन जे करे, ते आतमा पचखाण छे. ३८४.
शुभ ने अशुभ अनेकविध छे वर्तमाने उदित जे,
ते दोषने जे चेततो, ते जीव आलोचन खरे. ३८५.

* केवळज्ञानी जीवने साक्षात् ज्ञानचेतना होय छे. केवळज्ञान थया पहेलां पण, निर्विकल्प अनुभव वखते जीवने उपयोगात्मक ज्ञानचेतना होय छे. ज्ञानचेतनाना उपयोगात्मकपणाने मुख्य न करीए तो,
सम्यग्द्रष्टिने ज्ञानचेतना निरंतर होय छे, कर्मचेतना अने कर्मफळचेतना नथी होती; कारण के तेने
निरंतर ज्ञानना स्वामित्वभावे परिणमन होय छे, कर्मना अने कर्मफळना स्वामित्वभावे परिणमन
नथी होतुं.