कहानजैनशास्त्रमाळा ]
अवस्थामां पण थाय छे. अने ज्यारे अप्रमत्त अवस्था थाय छे त्यारे जीव पोताना स्वरूपनुं ज ध्यान करे छे; ते वखते, जे ज्ञानचेतनानुं तेणे प्रथम श्रद्धान कर्युं हतुं तेमां ते लीन थाय छे अने श्रेणि चडी, केवळज्ञान उपजावी, साक्षात् *ज्ञानचेतनारूप थाय छे. २२३.
अतीत कर्म प्रत्ये ममत्व छोडे ते आत्मा प्रतिक्रमण छे, अनागत कर्म न करवानी प्रतिज्ञा करे (अर्थात् जे भावोथी आगामी कर्म बंधाय ते भावोनुं ममत्व छोडे) ते आत्मा प्रत्याख्यान छे अने उदयमां आवेला वर्तमान कर्मनुं ममत्व छोडे ते आत्मा आलोचना छे; सदाय आवां प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान अने आलोचनापूर्वक वर्ततो आत्मा चारित्र छे. — आवुं चारित्रनुं विधान हवेनी गाथाओमां कहे छेः —
* केवळज्ञानी जीवने साक्षात् ज्ञानचेतना होय छे. केवळज्ञान थया पहेलां पण, निर्विकल्प अनुभव वखते
जीवने उपयोगात्मक ज्ञानचेतना होय छे. ज्ञानचेतनाना उपयोगात्मकपणाने मुख्य न करीए तो,
सम्यग्द्रष्टिने ज्ञानचेतना निरंतर होय छे, कर्मचेतना अने कर्मफळचेतना नथी होती; कारण के तेने
निरंतर ज्ञानना स्वामित्वभावे परिणमन होय छे, कर्मना अने कर्मफळना स्वामित्वभावे परिणमन
नथी होतुं.