Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 386.

< Previous Page   Next Page >


Page 534 of 642
PDF/HTML Page 565 of 673

 

समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
णिच्चं पच्चक्खाणं कुव्वदि णिच्चं पडिक्कमदि जो य
णिच्चं आलोचेयदि सो हु चरित्तं हवदि चेदा ।।३८६।।
कर्म यत्पूर्वकृतं शुभाशुभमनेकविस्तरविशेषम्
तस्मान्निवर्तयत्यात्मानं तु यः स प्रतिक्रमणम् ।।३८३।।
कर्म यच्छुभमशुभं यस्मिंश्च भावे बध्यते भविष्यत्
तस्मान्निवर्तते यः स प्रत्याख्यानं भवति चेतयिता ।।३८४।।
यच्छुभमशुभमुदीर्णं सम्प्रति चानेकविस्तरविशेषम्
तं दोषं यः चेतयते स खल्वालोचनं चेतयिता ।।३८५।।
नित्यं प्रत्याख्यानं करोति नित्यं प्रतिक्रामति यश्च
नित्यमालोचयति स खलु चरित्रं भवति चेतयिता ।।३८६।।
पचखाण नित्य करे अने प्रतिक्रमण जे नित्ये करे,
नित्ये करे आलोचना, ते आतमा चारित्र छे. ३८६.

गाथार्थः[पूर्वकृतं] पूर्वे करेलुं [यत्] जे [अनेकविस्तरविशेषम्] अनेक प्रकारना विस्तारवाळुं [शुभाशुभम् कर्म] (ज्ञानावरणीयादि) शुभाशुभ कर्म [तस्मात्] तेनाथी [यः] जे आत्मा [आत्मानं तु] पोताने [निवर्तयति] *निवर्तावे छे, [सः] ते आत्मा [प्रतिक्रमणम्] प्रतिक्रमण छे.

[भविष्यत्] भविष्य काळनुं [यत्] जे [शुभम् अशुभम् कर्म] शुभ-अशुभ कर्म [यस्मिन् भावे च] ते जे भावमां [बध्यते] बंधाय छे [तस्मात्] ते भावथी [यः] जे आत्मा [निवर्तते] निवर्ते छे, [सः चेतयिता] ते आत्मा [प्रत्याख्यानं भवति] प्रत्याख्यान छे.

[सम्प्रति च] वर्तमान काळे [उदीर्णं] उदयमां आवेलुं [यत्] जे [अनेकविस्तरविशेषम्] अनेक प्रकारना विस्तारवाळुं [शुभम् अशुभम्] शुभ-अशुभ कर्म [तं दोषं] ते दोषने [यः] जे आत्मा [चेतयते] चेते छेअनुभवे छेज्ञाताभावे जाणी ले छे (अर्थात् तेनुं स्वामित्व कर्तापणुं छोडे छे), [सः चेतयिता] ते आत्मा [खलु] खरेखर [आलोचनम्] आलोचना छे.

[यः] जे [नित्यं] सदा [प्रत्याख्यानं करोति] प्रत्याख्यान करे छे, [नित्यं प्रतिक्रामति च]

५३४

* निवर्ताववुं = पाछा वाळवुं; अटकाववुं; दूर राखवुं.