गाथार्थः — [पूर्वकृतं] पूर्वे करेलुं [यत्] जे [अनेकविस्तरविशेषम्] अनेक प्रकारना विस्तारवाळुं [शुभाशुभम् कर्म] (ज्ञानावरणीयादि) शुभाशुभ कर्म [तस्मात्] तेनाथी [यः] जे आत्मा [आत्मानं तु] पोताने [निवर्तयति] *निवर्तावे छे, [सः] ते आत्मा [प्रतिक्रमणम्] प्रतिक्रमण छे.
[भविष्यत्] भविष्य काळनुं [यत्] जे [शुभम् अशुभम् कर्म] शुभ-अशुभ कर्म [यस्मिन् भावे च] ते जे भावमां [बध्यते] बंधाय छे [तस्मात्] ते भावथी [यः] जे आत्मा [निवर्तते] निवर्ते छे, [सः चेतयिता] ते आत्मा [प्रत्याख्यानं भवति] प्रत्याख्यान छे.
[सम्प्रति च] वर्तमान काळे [उदीर्णं] उदयमां आवेलुं [यत्] जे [अनेकविस्तरविशेषम्] अनेक प्रकारना विस्तारवाळुं [शुभम् अशुभम्] शुभ-अशुभ कर्म [तं दोषं] ते दोषने [यः] जे आत्मा [चेतयते] चेते छे — अनुभवे छे — ज्ञाताभावे जाणी ले छे (अर्थात् तेनुं स्वामित्व – कर्तापणुं छोडे छे), [सः चेतयिता] ते आत्मा [खलु] खरेखर [आलोचनम्] आलोचना छे.
[यः] जे [नित्यं] सदा [प्रत्याख्यानं करोति] प्रत्याख्यान करे छे, [नित्यं प्रतिक्रामति च]
५३४
* निवर्ताववुं = पाछा वाळवुं; अटकाववुं; दूर राखवुं.