प्रकाशते ज्ञानमतीव शुद्धम् ।
बोधस्य शुद्धिं निरुणद्धि बन्धः ।।२२४।।
निश्चयचारित्र, ते ज ज्ञानचेतना (अर्थात् ज्ञाननुं अनुभवन) छे. ते ज ज्ञानचेतनाथी (अर्थात् ज्ञानना अनुभवनथी) साक्षात् ज्ञानचेतनास्वरूप केवळज्ञानमय आत्मा प्रगट थाय छे.
हवे आगळनी गाथाओनी सूचनारूप काव्य कहे छे, जेमां ज्ञानचेतनानुं फळ अने अज्ञानचेतनानुं (अर्थात् कर्मचेतनानुं अने कर्मफळचेतनानुं) फळ प्रगट करे छेः —
श्लोकार्थः — [नित्यं ज्ञानस्य सञ्चेतनया एव ज्ञानम् अतीव शुद्धम् प्रकाशते] निरंतर ज्ञाननी संचेतनाथी ज ज्ञान अत्यंत शुद्ध प्रकाशे छे; [तु] अने [अज्ञानसञ्चेतनया] अज्ञाननी संचेतनाथी [बन्धः धावन] बंध दोडतो थको [बोधस्य शुद्धिं निरुणद्धि] ज्ञाननी शुद्धताने रोके छे — ज्ञाननी शुद्धता थवा देतो नथी.
भावार्थः — कोई (वस्तु) प्रत्ये एकाग्र थईने तेनो ज अनुभवरूप स्वाद लीधा करवो ते तेनुं संचेतन कहेवाय. ज्ञान प्रत्ये ज एकाग्र उपयुक्त थईने तेना तरफ ज चेत राखवी ते ज्ञाननुं संचेतन अर्थात् ज्ञानचेतना छे. तेनाथी ज्ञान अत्यंत शुद्ध थईने प्रकाशे छे अर्थात् केवळज्ञान ऊपजे छे. केवळज्ञान ऊपजतां संपूर्ण ज्ञानचेतना कहेवाय छे.
अज्ञानरूप (अर्थात् कर्मरूप अने कर्मफळरूप) उपयोगने करवो, तेना तरफ ज ( – कर्म अने कर्मफळ तरफ ज – ) एकाग्र थई तेनो ज अनुभव करवो, ते अज्ञानचेतना छे. तेनाथी कर्मनो बंध थाय छे, के जे बंध ज्ञाननी शुद्धताने रोके छे. २२४.
हवे आ कथनने गाथा द्वारा कहे छेः —
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