Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 227.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५४७

चेति ४२ न कुर्वन्तमप्यन्यं समनुजानामि मनसा चेति ४३ न करोमि वाचा चेति ४४ न कारयामि वाचा चेति ४५ न कुर्वन्तमप्यन्यं समनुजानामि वाचा चेति ४६ न करोमि कायेन चेति ४७ न कारयामि कायेन चेति ४८ न कुर्वन्तमप्यन्यं समनुजानामि कायेन चेति ४९

(आर्या)
मोहविलासविजृम्भितमिदमुदयत्कर्म सकलमालोच्य
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।।२२७।।

इत्यालोचनाकल्पः समाप्तः अनुमोदतो नथी मनथी. ४३. हुं करतो नथी वचनथी. ४४. हुं करावतो नथी वचनथी. ४५. हुं अन्य करतो होय तेने अनुमोदतो नथी वचनथी. ४६. हुं करतो नथी कायाथी. ४७. हुं करावतो नथी कायाथी. ४८. हुं अन्य करतो होय तेने अनुमोदतो नथी कायाथी. ४९. (आ रीते, प्रतिक्रमणना जेवा ज आलोचनामां पण ४९ भंग कह्या.)

हवे आ कथनना कळशरूपे काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः(निश्चयचारित्रने अंगीकार करनार कहे छे के) [मोहविलास- -विजृम्भितम् इदम् उदयत् कर्म] मोहना विलासथी फेलायेलुं जे आ उदयमान (उदयमां आवतुं) कर्म [सकलम् आलोच्य] ते समस्तने आलोचीने (ते सर्व कर्मनी आलोचना करीने) [निष्कर्मणि चैतन्य-आत्मनि आत्मनि आत्मना नित्यम् वर्ते] हुं निष्कर्म (अर्थात् सर्व कर्मोथी रहित) चैतन्यस्वरूप आत्मामां आत्माथी ज (पोताथी ज) निरंतर वर्तुं छुं.

भावार्थःवर्तमान काळमां कर्मनो उदय आवे तेना विषे ज्ञानी एम विचारे छे केपूर्वे जे कर्म बांध्युं हतुं तेनुं आ कार्य छे, मारुं तो आ कार्य नथी. हुं आनो कर्ता नथी, हुं तो शुद्धचैतन्यमात्र आत्मा छुं. तेनी दर्शनज्ञानरूप प्रवृत्ति छे. ते दर्शनज्ञानरूप प्रवृत्ति वडे हुं आ उदयमां आवेला कर्मनो देखनार-जाणनार छुं. मारा स्वरूपमां ज हुं वर्तुं छुं. आवुं अनुभवन करवुं ते ज निश्चयचारित्र छे. २२७.

आ रीते आलोचनाकल्प समाप्त थयो. (हवे टीकामां प्रत्याख्यानकल्प अर्थात

् प्रत्याख्याननो विधि कहे छेः

(प्रत्याख्यान करनार कहे छे केः)